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Wednesday, September 2, 2009

क्या कहूं कि मन मेरा कुलाचें भर रहा है....

यही कोई सात-साढ़े सात का वक्त हुआ रहा होगा। मैं अपने कंप्यूटर से भिड़ा हुआ था जैसा कि अमूमन होता ही है क्योंकि सीसीटीवी कैमरा संपादक की तरह आंखे जो तरेर रहा था। इस दौरान बार-बार "ओह", "अर र", "उफ", "अबे देख के" ........ जैसी आवाजें मेरा ध्यान भंग करने लगीं। इन आवाजों ने फेविकोल के जोड़ की तरह कुर्सी से चिपके होने के बावजूद मुझे उस ओर जाने को मजबूर कर दिया जिस ओर से आवाजें आ रही थीं।
वह सोमवार, 31 अगस्त का दिन था और ऐसा कोई खास भी नहीं था। सुबह 11 बजे के आस-पास ऑफिस पहुंचा तो भी कुछ विशेष नहीं प्रतीत हुआ। सब कुछ सामान्य सा था मगर शाम को जो हुआ वह कभी भी सामान्य न था। करीब पांच बजे हमारे सहयोगी यादव जी ने मुझसे पूछा "भई आज मैच कितने बजे से है।" मैं अपनी कुर्सी पर आराम से बैठे-बैठे भी हड़बड़ा गया। मैं अपने सहयोगी को ऊपर से नीचे तक देखा और उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी देखी। मैं जैसे ही बोलने को हुआ वह बोले "चाहे जितने बजे से हो, मैच तो भारत ही जीतेगा।" मैं समझ तो गया कि वह नेहरु कप फुटबाल के फाइनल की बात कर रहे हैं, मगर अंजान बनते हुए पूछने की हिमाकत कर बैठा "किस मैच की बात कर रहे हैं यादव जी।" थोड़ा मुंह टेढ़ा करते हुए यादव जी बोले "क्यों मजाक करते हैं सरजी। आपको तो पता होना ही चाहिए। आखिर इसकी खबर भी तो आप ही बनायेंगे ना।" मुझे ताज्जुब हुआ कि क्रिकेट के अलावा किसी और खेलों के बारे में सपने में भी नहीं सोचने वाले यादव जी को फुटबाल की इतनी चिंता क्यों हो रही है। खैर, उनको मैंने समय तो बता दिया और अपने काम में लग गया।
यही कोई सात-साढ़े सात का वक्त हुआ रहा होगा। मैं अपने कंप्यूटर से भिड़ा हुआ था जैसा कि अमूमन होता ही है क्योंकि सीसीटीवी कैमरा संपादक की तरह आंखे जो तरेर रहा था। इस दौरान बार-बार "ओह", "अर र", "उफ", "अबे देख के" ........ जैसी आवाजें मेरा ध्यान भंग करने लगीं। इन आवाजों ने फेविकोल के जोड़ की तरह कुर्सी से चिपके होने के बावजूद मुझे उस ओर जाने को मजबूर कर दिया जिस ओर से आवाजें आ रही थीं। देखता हूं तो पांच-छह लोग टीवी की ओर पलक झपकाये बिना नजरें गड़ाए हुए थे। उनको इस तरह से टीवी से चिपके हुए देखकर यह भ्रम हो सकता था कि क्रिकेट का कोई बेहद रोमांचक मैच चल रहा होगा मगर नहीं, यहां तो एक फुटबाल के पीछे 22 खिलाड़ी भाग रहे थे और ये सभी सांस थामे एकटक टीवी से चिपके हुए थे। मैं भी उसी में शामिल हो गया। बमुश्किल दस मिनट में ही खेल के दोनों हाफ गोलरहित समाप्त हो गये मगर भारतीय खिलाड़ियों द्वारा गंवाए गये मौकों की आलोचना शुरु हो चुकी थी, जो उत्साह बढ़ाने वाली थी।
कारण, फुटबाल के बारे में भी कोई ऐसे बात कर सकता है। इस बातचीत में धीरे-धीरे और लोग भी शरीक होते गये और मैच की रोमांचकता हमारे ऑफिस में अपना जगह बना चुकी थी। अतिरिक्त समय में खिंचे मैच में जब रेनेडी सिंह ने फ्री किक पर गोल दागा तो स्टेडियम में क्रिकेट मैचों जैसी भीड़ ने भूटिया एंड कंपनी को सिर आंखों पर बिठा लिया तो यहां यादव जी ने अपने एक साथी को गोद में उठा लिया, मानो उसी ने गोल दाग हो। मैच खत्म होने से महज कुछ सेकंड पहले सीरियाई खिलाड़ी ने बराबरी का गोल दाग दिया तो स्टेडियम का सन्नाटा हमारे यहां भी पसर चुका था। "अबे, स्सा...??? दो मिनट तक गेंद अपने पास नहीं रख सकते थे।" "अबे यार सारा मजा किरकिरा कर दिया।" "चल बंद कर दे यार टीवी, अब तो स्सा...??? हार ही जायेंगे।" मगर कोई टीवी बंद करने के लिए आगे नहीं आया। बहरहाल पेनॉल्टी स्ट्रोक के साथ रोमांच अपनी हद तक पहुंच चुका था। यादव जी एक स्टूल पर बैठे हुए थे लेकिन सडेन डेथ शुरु होते ही वे एक पैर स्टूल पर रखकर जरा टेढ़े खड़े हो गये। यादव जी क्रिकेट के मैचों के दौरान अमूमन ऐसे ही खड़े होते हैं। सातवें शॉट को भारतीय गोलकीपर सुब्रत ने जैसे ही रोका, भारत चैंपियन बन बैठा। लगातार दूसरी बार, उसी सीरियाई टीम को हराकर। मगर मुझे लगा कि भारत नहीं बल्कि यादव जी, गोपाले जी और वहां उपस्थित लोग चैंपियन बन गये हों। यादव जी पीछे पलटे और मुझे उठाकर अतिरोमांचित होकर बोले " सर जी हम फिर चैंपियन बन गये।" उनका यह कहना मुझे जरा भावुक कर गया।
खैर,
क्रिकेट से इतर खेलों में जब भी कोई खिलाड़ी देश का नाम रोशन करता है, मुझे बेहद खुशी होती है। मगर क्रिकेट के प्रति जैसी दीवानगी देखने को नजर आती है, वैसी दीवानगी से कहीं से भी कमतर नहीं था वह माहौल जिसका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूं। दरअसल क्रिकेट की लोकप्रियता की आलोचना करने वालों से जरा मैं कम सहमत हूं, यह चाहने के बावजूद कि क्रिकेट से इतर खेलों को भी सम्मान मिले। मुझे ऐसा लगता है कि जब भी अन्य खेलों में कोई उपलब्धि देश ने हासिल की है, संबंधित खिलाड़ियों को प्रशंसकों ने सिर माथे बिठाया है। चाहे वह विजेंदर व सुशील का बीजिंग में कांस्य जीतना रहा हो, विश्वनाथन आनंद का शतरंज का विश्व चैंपियन बनना रहा हो, सोमदेव का टेनिस में प्रदर्शन रहा हो या सानिया मिर्जा का सनसनीखेज प्रदर्शन। सायना नेहवाल को तो यहां कतई नहीं भुलाया जा सकता जिन्होंने चंद महीनों में खुद को बैडमिंटन की दुनिया में शीर्ष दस खिलाड़ियों में शामिल करा लिया है।
वास्तव में हम भारतीयों को पहले उपलब्धि चाहिए होती है और तब हम उसके प्रति अपनी दीवानगी दिखाते हैं। क्या 1980 से पहले हॉकी की दीवानगी किसी से छिपी हुई थी। शायद नहीं, लेकिन 1980 के बाद हॉकी में पतन से दीवानगी में कुछ कमी आनी शुरु हो चुकी थी। इसी दौरान क्रिकेट, जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते थे, ने 1983 में वर्ल्डकप जीतकर इतिहास रच डाला। इस उपलब्धि ने हॉकी से निराश हो चुके प्रशंसकों को क्रिकेट की ओर मोड़ दिया। क्रिकेट में उस उपलब्धि के बाद सफलता के साथ-साथ दीवानगी का आलम पूरे देश को चपेट में लेता गया। कपिल देव, गावस्कर, तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी लोगों के मनमस्तिष्क में छाते गये। 1992 में जब पेस ने ओलंपिक में टेनिस में एकल का कांस्य जीता तो टेनिस की लहर छा गयी। बाद में लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी की ग्रैंडस्लैम उपलब्धियों ने देश को सराबोर कर दिया। इसी दौरान सानिया मिर्जा का अभ्युदय हुआ। शुरुआत में बेहतरीन खेल दिखाने वाली सानिया बाद में अपनी खूबसूरती के कारण चर्चा के केंद्र में रहीं और चोटों से उनका कैरियर प्रभावित हुआ मगर टेनिस की लोकप्रियता बढ़ाने में उनका योगदान कहीं से कम नहीं है। 1996 में ही कर्णम मल्लेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग में ओलंपिक कांस्य जीता मगर बाद में यह खेल डोपिंग में उलझ गया तो प्रशंसकों ने भी भुला दिया। 2007 में जब भारत ने नेहरु कप का खिताब जीता तो पश्चिम बंगाल के अलावा भी लोग इस खेल से जुड़ गये। उसी की याद में इस साल लोग टीवी से चिपके हुए रहे कि भारत खिताब जीत सकता है। बहरहाल भारत ने भी अपने प्रशंसकों को निराश नहीं किया लेकिन क्या होता अगर भारत हार जाता। शायद 1980 के बाद जो हश्र हॉकी का हुआ वह महज दो सालों में (2007-2009) में फुटबाल का हो चुका होता।
वास्तव में मेरा मन कुलाचें भर रहा है। कुलाचें इसलिए कि हम एक बार फिर नेहरु कप में चैंपियन बनकर उभरे और साबित किया कि हमारी पिछली जीत तुक्का भर नहीं थी। कुलाचें इसलिए भी कि हमने क्रिकेट से इतर फिर किसी खेल में अपना रुतबा कायम किया। कुलाचें इसलिए भी कि हम भारतीय किसी उपलब्धि का जश्न मनाना नहीं चूकते और पलकों पर बिठा लेते हैं। मगर मेरी शिकायत भी है खेलप्रेमियों से कि वे बहुत जल्दी ही खिलाड़ियों व उनकी उपलब्धियों को भुला देते हैं।


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Wednesday, July 8, 2009

"उयघूर दमन" पर उतारु चीन

वैसे ऐसा बहुत कम होता है कि दुनिया भर में कहीं भी मुस्लिम समुदाय या व्यक्ति पर, गलत/सही कोई भी कार्रवाई हो, चाहे ऐसे मामलों में मुस्लिम समुदाय ही दोषी क्यों न हो, दुनिया भर के मुस्लिम देशों में विरोध की आवाज जरुर उठती रही है मगर चीन में "उयघूर" मुस्लिमों के दमन पर अभी तक किसी भी देश ने कोई बयान जारी नहीं किया है. फ्रांस की सरकार ने हाल ही में जब बुर्के को महिलाओं की गुलामी की निशानी बताकर उस पर प्रतिबंध लगा दिया था तो कई मुस्लिम देशों ने इसे अपनी स्वतंत्रता और तहजीब पर आघात मानकर इसके खिलाफ आवाज उठायी थी. फ्रांस सरकार का यह फैसला गलत था या सही यह तो बात की बात लेकिन इन देशों का बुर्के के पक्ष में उनकी तहजीब और स्वतंत्रता पर खतरा उत्पन्न होने की दलील जरा गले नहीं उतरी क्योंकि महिलाओं को बुर्का पहनने पर मजबूर करना भी तो उनकी स्वतंत्रता पर तुषारापात जैसा ही है. इस बात पर आश्चर्य होता है उयघूर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध पश्चिमी देशों से आवाज उठ रही है लेकिन सारी दुनिया के मुसलमानों के हितों के लिए संघर्ष का दावा करने वाले ठेकेदार देश पाकिस्तान, ईरान और सउदी अरब की चीन के सामने घिग्घी बंधी हुई है। खैर, बात उयघूरों की
चीन के शिनझियांग प्रांत के उरुकमी में उयघूर मुस्लिमों और हान चीनियों के बीच पिछले कुछ दिनों की टकराव में सैकड़ों लोगों के मारे जाने के बीच मुस्लिम देशों की चुप्पी सालने वाली है। वैसे उयघूर मुस्लिमों के प्रति चीनी सरकार का यह दमनात्मक रवैया कोई पहली बार नहीं है। कई बार तो खबरों पर सरकारी नियंत्रण के चलते ऐसी खबरें बाहर नहीं आ पातीं. पिछले दो-तीन दिनों में शिंनझियांग के उरुकमी में उयघूर मुस्लिमों और हान चीनियों के बीच संघर्ष में पौने दो सौ उयघूर मुस्लिम मारे गये हैं। लगभग एक हजार घायल हैं। इस बीच शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया है जिसका सीधा सा मतलब है कि उयघूरों के प्रति चीनी सरकार के रवैये में कोई अंतर आने वाला नहीं है. चीन की इस दमनात्मक नीति के खिलाफ उयघूर मुस्लिम विरोध का झंडा बुलंद किए हुए हैं. इन विरोध प्रदर्शनों की सारी कार्रवाई, विश्व उयघूर कांग्रेस की नेता रबिया कदीर द्वारा चलायी जा रही है. रबिया कदीर उयघूर की एक निर्वासित महिला व्यावसायी हैं और फ़िलहाल अमेरिका में हैं. सुश्री कदीर को चीन सरकार ने अलगाववादी कार्रवाइयों में संलिप्त रहने का आरोप लगा कर उन्हें कई सालों तक जेल में बंद रखा था. उयघूर अलगाववादी समूहों का कहना है कि लोगों का विरोध सरकारी नीतियों और आर्थिक लाभों पर हान चीनी एकाधिकार के खिलाफ़ है. लेकिन अपनी भौगोलिक सीमा बढ़ाने को लेकर अक्सर ही दादागिरी करने वाला चीन इसे हिंसा फैलने के तौर पर देख रही है. वैसे भी चीनी सरकार ने कभी उयघूर मुस्लिमों के प्रति सम्माजनक नजरिए से देखने की जरुरत नहीं समझी.
* क्यों हुआ संघर्ष
दरअसल संघर्ष की वास्तविक वजह सालों से चले आ रहे चीनियों व उयघूरों के परस्पर संबंधों में छिपी है। दूसरे शब्दों में कहें तो आज मूल चीनी हान समुदाय व उइगरों के बीच सौहा‌र्द्र का एक अंश भी नहीं बचा। उयघूर और हान चीनियों के बीच हुई हिंसा के पीछे की कहानी यह है कि पिछले महीने उरुमकाई शहर की एक स्थानीय वेबसाइट पर यह लिख दिया गया कि शिनझियांग प्रांत से आए हान मूल के लड़कों ने दो उयघूर लड़कियों के साथ बलात्कार किया है. इसके बाद ही हान और उयघूर समुदायों के बीच संघर्ष में दो लोगों की मौत हो गयी थी जबकि 118 घायल हो गये थे. उस घटना के बाद से दोनों ही समुदायों में बदले की आग सुलग रही थी जिसने बीते रविवार की रात दंगों का रुप ले लिया. दंगों की शुरुआत शिनझियांग की राजधानी उरुमकी में शुरु हुई. इसके बाद से ही हुए संघर्ष में 166 से अधिक लोग मारे गये. चूंकि इस इस संघर्ष के बाद चीनी सरकार ने इंटरनेट पर रोक लगा दी, इसलिए उसकी कार्रवाई पर संदेह होना लाजिमी है.
* संघर्ष के मूल में कुछ और तो नहीं
वैसे इस संघर्ष के मूल में कुछ दूसरी कहानी भी हो सकती है. उयघूर मुस्लिमों का आरोप है कि चीन की सरकार हान लोगों कों उरुमकाई शहर में जबरदस्ती बसा रही है. उरूमकाई शहर (शिनझियांग प्रांत) की बात करें तो यह चीन का मुस्लिम बहुल इलाका है। उरुमकाई की आबादी लगभग 23 लाख के करीब है जबकि शिनझियांग क्षेत्र में 80 लाख उयघूर मुस्लिम हैं. ये उयघूर समुदाय चीनी सरकार पर अपने अधिकारों के दमन का आरोप लगाते रहे हैं। शिनझियांग प्रांत मूल रुप से उयघूरों का ही क्षेत्र है लेकिन उसकी स्वायत्तता चीन को बर्दाश्त नहीं हुई और पूर्व में उसने इस क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाने के बाद धीरे-धीरे चीन के मूल निवासियों हान को बसाना शुरु कर दिया. इससे न सिर्फ असंतुलन बढ़ा बल्कि इन दोनों समुदायों के बीच संघर्ष शुरु हो गया. इस संघर्ष के बहाने चीन सरकार को अपनी दमनात्मक नीति को आगे बढ़ाने का मौका और छूट मिल गयी. वैसे भी उसकी बढ़ती ताकत को देखकर कोई और देश उसके खिलाफ आवाज नहीं उठा पाता. उयघूर की स्थिति की तुलना चीन के कब्जे वाले तिब्बत से की जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख कर चीन जिस तरह तिब्बत को हड़पे बैठा है वैसा ही उसने शिंनझियांग प्रांत के तेल बहुल उस इलाके में किया जहां उयघूर मुसलमान अधिक हैं। लेकिन तिब्बत की तुलना में शिंनझियांग की परिस्थितियां थोड़ी भिन्न हैं। वैसे चीनी की नजर इस क्षेत्र पर इसलिए भी है क्योंकि यह तेल व खनिज भंडारों से समृद्ध है. शिनझियांग की सीमा मध्य एशिया के आठ देशों को छूती हैं, जिनमें भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी शामिल हैं। चीन की बढ़ती आर्थिक व राजनीतिक ताकत के प्रति उयघूर नाखुशी दर्शाते रहे हैं। उयघूरों व चीनियों के संबंध सदियों पहले सिल्क रूट से जुड़े हैं। इसी सिल्क मार्ग से पश्चिम एशिया, यूरोप व भारतीय उपमहाद्वीप में चीनी रेशम का व्यापार होता था। लेकिन बीते रविवार को शिनजियांग की राजधानी उरुमकी में भड़के दंगों में सारी सीमाएं टूट गईं।
* उयघूर कौन
इस्टर्न और सेंट्रल एशिया में निवास करने वाले उयघूर मूलत: तुर्की समुदाय से संबंध रखने वाले मुस्लिम हैं। वर्तमान की बात करें तो ये मुख्यरुप से चीन के शिनझियांग क्षेत्र में रहते हैं जिसे "शिनजियांग उयघूर ऑटोनॉमस रीजन" कहा जाता है. वैसे इसे इसके विवादास्पद "उयघूरस्तान/पूर्वी तुर्कीस्तान" के नाम से भी जाना जाता है. (अंग्रेजी में Uyghur, Uighur, Uygur और Uigur के रुप में प्रयोग किया जाता है.) उयघूर मुस्लिम कजाखस्तान, किर्गीस्तान, उजबेकिस्तान में अधिक संख्या में और मंगोलिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रुस में कुछ संख्या में हैं लेकिन मुख्य रुप से अब यह समुदाय चीन की राजधानी बीजिंग और शंघाई में ही हैं.इतिहास की नजर से देखें तो तुर्की भाषा बोलने उयघूर मध्य एशिया के एल्टे माउंटेन, गोक्टर्स के आस-पास रहने वाले थे। पिछले दो हजार सालों में उयघूर मुस्लिमों ने काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी यहां राज करने वाले उयघूर आज दमन सहने पर मजबूर हैं।
* आतंकवादी बताता रहा है चीन
प्राचीनकाल से विस्तारवादी प्रवृत्तिवाला चीन कभी उयघूर मुस्लिमों पर विश्वास नहीं कर सका। चीन उन्हें हमेशा से ही पृथकतावादी और उग्रवादी बताया जाता रहा और इसके नाम पर उनका निरंतर दमन किया गया। ताजा विवाद के बाद यह तो तय है कि उयघूर मुस्लिमों में चीनी शासकों के प्रति नफरत दो गुनी बढ़ चुकी होगी। उनका संघर्ष और विरोध इस तरह के दमन से दम नहीं तोडऩे वाला। उयघूर दशकों से चीन से स्वतंत्रता के लिए आंदोलन कर रहे हैं। उनका धैर्य जब टूटने लगता और हताशा बढ़ती है तो वे हिंसा का सहारा लेने लगते हैं। लेकिन चीनी सरकार द्वारा बताया यह जाता रहा कि संदिग्ध उयघूर मुस्लिम आतंकवादियों की धरपकड़ के लिए इस तरह की कार्रवाई की जाती है। इन आरोपों को गलत नहीं कहा जा सकता कि चीन की जेलों और गुप्त यातनागृहों में सैकड़ों उयघूर मुस्लिम फंसे हुए हैं। पिछले साल बीजिंग ओलंपिक के दौरान चीन में हुए भीषण विस्फोट में डेढ़ दर्जन पुलिसकर्मी मारे गये थे। तब इसे सरकार ने उयघूर आतंकवादियों की करतूत करार दिया था और कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया था
* थोपा गया सांस्कृतिक औपनिवेशवाद
सामान्य रूप से देखें तो उयघूर व चीन के संबंध खासे उलझे नजर आते हैं। शिनजियांग चीन के बनिस्बत पाकिस्तान, उज्बेकिस्तान व कजाखिस्तान के कहीं ज्यादा करीब दिखाई देता है। काशगर की सड़कों पर घूमते हुए ऐसा नही लगता कि यह चीन का कोई इलाका है। चीन लोगों की राय में उयघूरों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। वे जेबकतरे हैं और ऐसे ही कामों में लिप्त रहते हैं। दोनों की संस्कृति, आचार-विचार, धर्म व राजनीति सोच में काफी भिन्नता है। यही कारण है कि उयघूर समुदाय इसे थोपा गया सांस्कृतिक औपनिवेशवाद करार देते हैं जबकि चीनी सरकार का कहना है कि अलगाववादी उयघूर इस्लामिक कंट्टरपंथी हैं जिनका मकसद शिनझियांग को चीन से आजाद कराना है। जानकारों की राय में 1989 में थ्येनआनमन नरसंहार के बाद चीन में यह सबसे बड़ी घटना है। वर्तमान में उरुम्की में हानवंशी चीनियों का दबदबा बढ़ रहा है। शिनझियांग में करीब एक करोड़ उयघूर रहते हैं और अधिकांश चीन से आजादी चाहते हैं। उनके मुताबिक यहां रह रही हानवंशियों की एक बड़ी आबादी उन्हें बाहर खदेड़ने पर तुली है। मानवाधिकार समूहों व उयघूर कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार हर चीज को बढ़ा-चढ़ा कर बता रही है ताकि अपनी दमनात्मक कार्रवाई को सही ठहरा सके।


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Wednesday, July 1, 2009

"कहीं फिर न फैले नफरत की आग"


कॉमन मैन की चिंता

अंतत: 17 साल और 46 एक्सटेंशन (विस्तार) के बाद लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट आखिरकार सरकार को सौंप ही दी। हम तो भूल ही चुके थे कि बाबरी विध्वंस और अयोध्या राम मंदिर जैसा कुछ बवाल भी इस देश में हुआ था। लेकिन लिब्रहान ने उसकी याद दिला दी और अयोध्या का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया. .....

छह दिसंबर 1992, यानि पूरे देश को धार्मिक और राजनीतिक नफरत की आग में झोंकने वाला जिन्न। वैसे यह जिन्न इस बार जून के अंतिम दिवस पर बाहर निकला और सरकार के हाथों में समा गया और संसद में पेश होने के बाद अपना असर दिखाने की तैयारी कर रहा है. वैसे इस रिपोर्ट को 31 मार्च से पूर्व ही आने की उम्मीद थी लेकिन सर पर खड़े चुनाव ने कांग्रेसी रणनीतिकारों को चिंतन में डाल दिया. उन्हें भय था कि कहीं रिपोर्ट आ गयी और इसका लाभ भाजपा को मिल गया तो ......। यही कारण है कि लिब्रहान को तीन और अधिक महीने दे दिये गये. अब यह समय लीपापोती/दोषारोपण के लिए रहा हो या किसी और कारण से इसका पता तो तब चलेगा जब यह संसद में पेश होगा लेकिन,

यह भारत है और यहां कत्ल करने वाला तुरंत हिरासत में ले लिया जाता है लेकिन हजारो लोगों की जान लेने वाला सत्ता में बैठकर देश चलाता है। अपने आरोपों को आयोगों के हवाले कर देता है और फिर उसे अपनी अंगुलियों पर नचाता है. जिस देश का प्रधानमंत्री आयोग द्वारा दोषी ठहराया जाता है उस पर भी आरोप तभी तय होता है जब वह इस दुनिया से विदा ले लेता है. सामूहिक हत्याओं के ऐसे आरोपी बड़े नेता कहे जाते हैं और अपने स्वार्थ के लिए हत्या करने वाले शिबू सोरेन जैसे लोग सजा पाने के बाद जमानत पर छूटते हैं और फिर मुख्यमंत्री तक बन जाते हैं.

अब इस रिपोर्ट के पेश होने के बाद कॉमन मैन इस चिंता में डूब गया होगा कि इन 17 सालों में विवादों/धर्मों के पुल के नीचे से इतना पानी गुजर चुका था कि बाबरी विध्वंस जैसी चीजें जेहन से उतर चुकी थीं, अब एक फिर मुंह बाये उठ खड़ी हो गयी। राजनेताओं को अभी यह नहीं पता कि इस रिपोर्ट में क्या है, कौन दोषी है और किसको बचाये जाने का प्रयास किया गया है और भी न जाने क्या-क्या.........? लेकिन बयानों का सिलसिला कुछ ऐसा चला कि कॉमन मैन टेंशन में आ गया. ऐसा न हो कहीं फिर से देश नफरत की आग में न झोंक दिया जाय..........,

किसी ने कहा "मैं फांसी पर चढ़ने के लिए तैयार हूं" तो किसी को बाबरी विध्वंस पर गर्व होता है। इन आलोचनाओं और बिना कुछ तथ्य सामने आये ही बौरा-बौरा कर गर्व की अनुभूति और फांसी पर चढ़ने में डर नहीं जैसा बयान देने का मकसद इतना भर है कि इस मुद्दे को इतना उछाल दिया जाए कि उनकी ओर उठने वाली अंगुलियों का रूख खुद ब खुद दूसरी ओर मुड़ जाए। अयोध्या के नाम पर इस देश में पहले ही काफी नफरत बोई जा चुकी है। अब इस नाम पर नफरत के किसी नए अध्याय की जरूरत इस महादेश को बिल्कुल भी नहीं है। आयोग की रिपोर्ट पर जो कुछ भी दो वह संविधान के दायरे में हो, कानून के दायरे में हो। रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक रोटियां सेकने की इजाजत किसी को भी नहीं होनी चाहिए।

और वैसे भी, आप फांसी पर चढ़ें या आपको गर्व हो, इससे आम आदमी को क्या, उसे तो आप उसकी जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ दीजिए....... आप बेशक फांसी पर चढ़ जायें लेकिन कॉमन मैन को नफरत की आग में तो मत धकेलिए.........., आपको गर्व होता है तो हो, कॉमन मैन को तो इस बात पर गर्व होता है कि एक परंपरावादी परिवार की मुस्लिम लड़की संस्कृत में टॉप करती है ( केरल के कोल्लम के सस्थामकोट्टाह में देवासोम बोर्ड के एक कॉलेज की 21 साल की छात्रा रहमत का कहना है कि संस्कृत और वेदांत हमारी राष्ट्रीय संस्कृति का प्रतीक हैं।), क्या हम देश की उपलब्धियों पर गर्व नहीं कर सकते........ या फिर हमें कॉमन मैन होने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा.........।

हमारे नेताओं को क्या फर्क पड़ता है कि कलुआ भूखमरी का शिकार हो सिधार गया, दोपहर भोजन योजना में देश के भविष्य को खिलाये जाने वाले खाने में छिपकली मिलता हो, पानी के लिए करोड़ो फूंक दिये जाने के बाद भी पानी के लिए लोग खून के प्यासे हो जायें......... उन्हें चिंता है तो इस बात की कि वह किस तरह से किसी भी मुद्दे का फायदा उठा सकें और राजनीतिक गोटियां सेंक सकें, देश जाये चूल्हे भाड़ में और देश कॉमन मैन का ही तो है........... इन नेताओं का नहीं........... सो कॉमन मैन जाये चूल्हे भाड़ में...........,

लेकिन कॉमन मैन तो यही चाहता है कि इस रिपोर्ट के बाद हमारे आका उसे फिर से नफरत की आग में न झोंक दें..........


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Monday, June 22, 2009

शायद मेरी समझ जरा कमजोर है...

1) 21 जून को भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल ने इंडोनेशियाई ओपन सुपर सीरीज बैडमिंटन टूर्नामेंट जीतकर इतिहास रचा। किसी भी सुपर सीरीज बैडमिंटन टूर्नामेंट में खिताब जीतने वाली पहली भारतीय बनीं।
2) 21 जून को ही पाकिस्तान ने श्रीलंका को हराकर ट्वेंटी-20 वर्ल्डकप का खिताब जीता और,
3) 21 जून को ही इंग्लैंड ने न्यूजीलैंड को हराकर ट्वेंटी-20 महिला वर्ल्डकप का खिताब अपने नाम किया।
दरअसल मेरी कोशिश यह ध्यान दिलाने की नहीं है कि 21 जून को खेल की कौन-कौन सी गतिविधियां रहीं, मेरी कोशिश तो कुछ और ही पहलू पर ध्यान दिलाने की है। रविवार को यह सभी खबरें किसी भी अन्य खबरों से अधिक महत्वपूर्ण रहीं और जैसी की उम्मीद थी सभी अखबारों ने इन खबरों को अपने पहले पन्ने पर जगह दी। खेल प्रेमी होने के बावजूद सोमवार को अखबारों में छपी इन खबरों को देखकर दिल बाग-बाग हो गया हो, ऐसा नहीं है। सभी अखबारों ने अपनी नीतियों और महत्व के हिसाब से ही इन खबरों को स्थान दिया होगा, ऐसा मेरा सोचना है। मैं गलत भी हो सकता हूं लेकिन भोपाल में होने के कारण भोपाल के अखबारों में छपी इन खबरों पर नजर डालें तो मन कुछ उदास सा हो गया।
यहां के कुछ अखबारों ने इन खबरों का जिस तरह से प्रस्तुतीकरण किया उससे मेरा खेलप्रेमी ह्रदय कुछ निराश सा हो गया। चूंकि सभी अखबार अपने देश के ही हैं और उसके पाठकों में भी लगभग सभी हिंदुस्तानी ही हैं ऐसे में खबर वह महत्वपूर्ण थी जिसमें भारतीय संदर्भ और उपलब्धि छिपी हुई थी। जी हां, यहां बात सायना नेहवाल की हो रही है। सायना की उपलब्धि किसी भी मायने में अन्य दो खबरों से कम नहीं थीं, बल्कि अधिक ही थीं। ऐसे में एक लीडिंग अखबार का पहले पन्ने पर पाक के चैंपियन बनने की खबर को अधिक कवरेज देना और सायना के सयाने प्रदर्शन को बेहद कम जगह देना सालने वाला रहा।
कहीं इसलिए तो नहीं कि सायना का यह प्रदर्शन क्रिकेट नहीं बैडमिंटन के लिए आया और व्यावसायिक नजरिए से बैडमिंटन क्रिकेट से कहीं अधिक पीछे है?
यही नहीं उक्त अखबार ने खेल पन्ने पर भी सायना को अन्य खबरों से कम स्पेस देकर खेल प्रेमियों को निराश ही किया। आखिर जिस उपलब्धि को प्रकाश पादुकोण और पी गोपीचंद के ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन टूनार्मेंट की खिताबी जीत के बराबर माना जा रहा हो और जैसा किसी अन्य भारतीय ने पहले नहीं किया रहा हो, उसकी फोटो वर्ल्डकप लिए पाकिस्तान के शाहिद अफरीदी, यूनिस खान, शोएब मलिक से कम महत्वपूर्ण कैसे हो सकती है? मुझे समझ नहीं आया, संभवत: मेरी समझ जरा कमजोर है। एक अन्य अखबार ने भी ऐसा ही किया और बेहद निराशाजनक तरीके से, जिसमें सायना की खबर ढूंढने पर मिली और पाक जीत की खबर एकदम सामने ही नजर आई।अपनी इस निराशा के बीच एक अन्य अखबार ने पहले पन्ने का जो ले-आउट दिया, उसकी चर्चा न करुं तो शायद ज्यादती होगी. उक्त अखबार ने सायना की जो फोटो प्रकाशित की है उसमें वह तिरंगा लहरा रहीं हैं। एक खेलप्रेमी को वह फोटो बेहद आकर्षक लगी और उसको दिया गया उचित स्थान भी. इस अखबार ने भी पाक जीत की और इंग्लैंड की जीत की फोटो पहले पन्ने पर ही दी और बकायदा पैकेज बनाकर लेकिन उसमें गंभीरता दिखी। उसने सायना की तिरंगे वाली फोटो के बैकग्राउंड के रुप में पाक के चैंपियन बनने की खबर और इंग्लिश महिलाओं की जीत की खबर लगाई। इस फोटो से मेरे खेल मन को कुछ ऐसा संदेश मिला कि "सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी"
मुझे ऐसा लगता है कि जिस खिताब को जीतकर सायना ने देश को गौरवान्वित किया हो, वह खबर अन्य खबरों से छोटी कैसे हो सकती है. और यही वजह है कि विभिन्न अखबारों में प्रकाशित इन खबरों को देखकर जब मन विचलित हुआ तो अपने दिल की बात लिख दी. हालांकि लिखते समय मुझे बराबर यह लगता रहा कि मेरी समझ शायद कमजोर है, फिर भी लिखता गया...


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Sunday, June 21, 2009

सायना का "सयाना' प्रदर्शन


  • इंडोनेशिया ओपन सुपर सीरीज बैडमिंटन खिताब जीता
  • सुपर सीरीज जीतने वाली पहली भारतीय बनीं

क्रिकेटिया चकाचौंध से इतर जब किसी अन्य खेलों में भारतीय उपलब्धि की कोई खबर आती है तो वह हवा के ठंडे झोंके के समान होती है और दिन को सुकूं का अहसास करा जाती है. बीजिंग ओलंपिक में मुक्केबाज विजेंदर कुमार और पहलवान सतीश कुमार का कांस्य पदक जीतना ऐसे ही एक झोंके के समान आया था और खेल प्रशंसकों को पहली बार क्रिकेट से अलग दूसरे खेलों के बारे में उपलब्धियों का बखान करते भी सुना. अब एक बार फिर ऐसी ही खबर आई है जब सीना गर्व से चौड़ा हो गया है. बीजिंग ओलंपिक की बैडमिंटन स्पर्धा में अपने प्रदर्शन से दुनिया को चकाचौंध करने वाली भारतीय शटलर सायना नेहवाल ने सुपर सीरीज बैडमिंटन टूर्नामेंट इंडोनेशियाई ओपन पर खिताब जमा लिया है.
वैसे तो सायना का सुपर सीरीज का यह पहला खिताब है लेकिन इतिहास रचते हुए आया. आज तक किसी भी भारतीय ने कभी सुपर सीरीज खिताब पर कब्जा नहीं जमाया था लेकिन सायना ने यह कर दिखाया. सायना का यह सयाना प्रदर्शन उस समय आया जब देश के खेल प्रशंसक माफ कीजिएगा, क्रिकेट प्रशंसक निराशा और हताशा के शिकार थे. दरअसल क्रिकेट से उम्मीद लगाये इन दर्शकों को उम्मीद थी कि भारतीय टीम ट्वेंटी-20 वर्ल्ड का खिताब बरकरार रखने में सफल रहेगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और इस टूर्नामेंट के सुपर आठ चरण से टीम इंडिया बेआबरु होकर बाहर निकली. इस चरण में वह एक भी मुकाबला जीत नहीं सकी और लीग चरण में बांग्लादेश और हालैंड की टीम को ही हरा सकी. इस बेहद कमजोर प्रदर्शन ने प्रशंसकों को पूरी तरह से निराश कर दिया था लेकिन आज रविवार का दिन देश के लिए न सिर्फ उपलब्धियां लेकर आया बल्कि इन प्रशंसकों को एक ठंडी हवा का झोंका भी दे गया. सायना की इस उपलब्धि को ऑल इंग्लैंड चैंपियन प्रकाश पादुकोण तथा सायना के मौजूदा कोच पुलेला गोपीचंद की उपलब्धि के समकक्ष आंका जा सकता है. सायना की यह उपलब्धि भारतीय खेल के इतिहास में मील का पत्थर है और इसे स्वीकार करते हुए भारतीय बैडमिंटन संघ ने सायना को दो लाख रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की है.
एक और बात,
सायना नेहवाल अपने पिता और वैज्ञानिक डॉ. हरवीर सिंह के काफी क्लोज्ड हैं और उनकी यह उपलब्धि खास दिन पर आई. आज फादर्स डे है और इससे बेहतर तोहफा किसी पिता के लिए और क्या हो सकता है. सायना की उपलब्धि से गौरवांन्वित महसूस कर रहे उनके पिता हरवीर ने इसे देश के लिए विशेष क्षण करार दिया और कहा कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है. हरवीर जी आप ही को क्यों, पूरे देश को सायना की इस उपलब्धि पर गर्व है.


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Monday, June 15, 2009

"समरसता" कैसी और कैसी "शर्म"

(सुधीर कुमार)
उत्तर प्रदेश में एक दलित नेता हैं जो कि खुद को "दलितों का मसीहा" कहती हैं और प्रदेश की सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हैं। जी हां, बात बहन बहन मायावती की ही हो रही है. स्वर्गीय कांशीराम ने दलितों को समाज की मुख्यधारा से जोडने जिस बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठन किया, उसके वर्तमान कार्यरुप को देखकर तो कांशीराम की आत्मा क्या महसूस करती होगी यह तो वही जानें, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि मायावती ने उनकी नीतियों पर पलीता लगाने का काम ही किया है. खैर बात बीएसपी की मायावी नीतियों की नहीं बल्कि "समरसता दिवस" और "शर्म दिवस" की.
दरअसल 19 जून को कांग्रेस महासचिव और देश के युवा नेता राहुल गांधी का जन्मदिवस है. कांग्रेसी जहां इसे समरसता दिवस के रुप में मना रहे हैं वहीं मायावती और उनकी बसपा ने इसी तारीख से शर्म करो अभियान शुरु करने का ऐलान किया है. दरअसल बसपा सुप्रीमो मायावती को लगता है कि "समरसता दिवस" से प्रदेश में भाईचारा टूटेगा और जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा इसलिए ऐसे दलों (स्पष्ट रुप से कांग्रेस की ओर है माया का इशारा) को शर्म करो-शर्म करो कहकर हतोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए मायावती ने 19 जून को देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाने का फैसला किया। अब शर्म किस बात की यह तो माया ही जानें लेकिन इससे समरसता शब्द स्वयं को लघु और विभाजक समझने लगा है. माया की शर्मिंदगी अगर समरसता दिवस को लेकर है तो शर्म किसको आना चाहिए, इसका जवाब माया से मांगा जाना चाहिए. मायावती तो कहती हैं कि कांग्रेस और बीजेपी के नेता दलित वर्ग का हितैषी बनने का ढोंग कर रहे हैं। चलिए माया ही सही, तो फिर वह बताएं कि यूपी की सत्ता पर काबिज होने के अलावा दलित वर्ग से उनका क्या हित रहा और वह उस वर्ग के प्रति कितनी हितैषी रहीं? कितने दलितों का उद्धार उन्होंने किया और कितने दलितों ने खुद को मजबूत महसूस किया. आज भी यूपी के जिलों में दलितों पर अत्याचार की कहानी आम है, बांदा, झांसी, हमीरपुर से लेकर पूर्वांचल के गांवों तक नजर फेर डालिए. कहां पर दलित समाज की मुख्य धारा से जुडा हुआ नजर आया.
और, मायावती को समरसता दिवस मनाने पर शर्म आती है तो यह शर्म उनको तब क्यों नहीं आई जब यूपी को समाजवादी पार्टी समेत अन्य दलों के क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेताओं को सत्ता से बाहर करने के लिए विधानसभा चुनावों के दौरान चलाये गये अभियान कि " चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर" की सफलता के बाद "वे सभी गुंडे" एक-एक कर बसपा में नजर आते गये. उनको तो शर्म तब भी नहीं आई जब जनता ने यह कहना शुरु कर दिया कि "चढ़ गये गुंडन छाती पर, मुहर लगाकर हाथी पर।"
मायावती को शर्म तब भी नहीं आती जब वह सड़को से अपना काफिला गुजरने से पूर्व सडकों को हजारो लीटर पानी से धुलवाती हैं. कई जगह से तो यह भी सुनने को मिला कि सड़कें धुलवाने के लिए मिनरल वॉटर तक का प्रयोग किया गया. यानि जिस जनता ने उन्हें गद्दी पर बैठाया, उससे उन्हें इन्फेक्शन का खतरा था.
यही नहीं, हर बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती का गुमान कुछ इस कदर कुलाचें मारता रहा कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को मीटिंग के दौरान अपनी कुर्सी से नीचे ही बैठने पर मजबूर किया. यह नीचे बैठना दरी या केवल फर्श पर बैठना ही रहा. उनका खौफ ऐसा रहा कि आईएएस अधिकारी भी हाथ जोडे नजर आये. मायावती को तब शर्म नहीं आई और अब आ रही है, शर्म भी किससे, समरसता से, मानो इस पर केवल उन्हीं का अधिकार है. अगर यही बात है तो मायावती में कब दिखी/दिखेगी समरसता.
* गांधी को भी नहीं बख्शा
कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ 19 जून से अपने शर्म करो अभियान की शुरुआत के लिए मायावती की पार्टी ने जो पर्चे जारी किए हैं, उस पर माया को शर्म नहीं आती. इन पर्चों में मायावती ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को नाटकबाज घोषित कर दिया। मायावती शायद यह भूल गयी हैं कि यह गांधी ही थे, मायावती नहीं- जिन्होंने ऊंच-नीच को खत्म करने के लिए खुद अपने हाथ में झाड़ू उठाकर शौचालय तक साफ किए थे। और, जिस युग में गांधी ने यह काम किया था उस युग में ऐसा सोच पाना भी आम हिन्दुस्तानी के लिए संभव नहीं था। मायावती जिस भीमराव अंबेडकर की बात करती हैं, कुछेक अपवादों को छोड़कर वह गांधीवाद के बड़े समर्थक माने जाते रहे हैं. ऐसे में मायावती की आलोचना क्या अंबेडकर की आलोचना भी नहीं है.
वैसे तो गांधी जी से मायावती का वैर पुराना है। लेकिन इस बार की टीस कुछ और ही है। जिस दलित वोट बैंक के सहारे मायावती जाति की राजनीति करती रही हैं, लोक सभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि उस वोट बैंक का रूझान फिर से कांग्रेस की ओर बढ़ने लगा है। अपने हाथों से इस वोट बैंक के खिसक जाने की आशंका से मायावती हतप्रभ सी रह गई हैं। और यही उन्हें गांधी के गिरेबान को छूने की हिमायत करने को मजबूर कर रही है। गांधी पर कीचड़ उछालने वाली मायावती शायद यह भूल गयी हैं कि सीबीआई और सुप्रीम कोर्ट में जो भी मामले उन पर चल रहे हैं वे समाज सेवा के नहीं ही हैं।
- अब बात राहुल गांधी की
बसपा के शर्म दिवस के मूल में राहुल गांधी का दलित लोगों के घर में जाकर खाना खाना या रात बिताना है। हो सकता है यह राहुल गांधी का नाटक हो जिसे वह लंबे समय से बिना रुकावट के कर रहे हैं लेकिन केक वाले कल्चर को छोड़कर दलित के घर खाना खाने का नाटक करने की हिम्मत राहुल गांधी के पास है तो सही। क्या मायावती ने कभी ऐसा किया है. शायद वह ऐसा सोच भी नहीं सकतीं. आज मायावती सबसे अधिक वैभवशाली हैं, उन्हें जन्मदिन में करोड़ों के तोहफे मिलते हैं जो उन दलित वर्ग से एकत्रित किए गये हैं, जिसकी वह मसीहा कहलाना पसंद करती हैं. यह रकम इन वर्गों के कई हफ्तों तक पेट पालने के लिए पर्याप्त होती, क्या इस रकम का उपयोग कभी दलित वर्ग के लिए हुआ।
ऐसा लगता है कि मायावती ने अपना विवेक खो दिया है. माया के पास सब कुछ हो सकता है लेकिन पैसों से विवेक नहीं खरीदा जा सकता। वह दलित की बेटी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया का आरोप लगाकर अपने वोट बैंक को भावुक कर सकती हैं लेकिन वास्तविकताओं से मुंह मोड़ना इस दलित की बेटी को गर्त की ओर ही ले जायेगा. मायावती को अब अपने पत्थरों की मूर्ति से अधिक चिंता उसकी करनी चाहिए जिसने उन्हें ऐसा करने की ताकत दी है. और, राहुल गांधी का जन्मदिवस अगर समरसता दिवस के रुप में मनाने की घोषणा हुई है तो यह उनकी (वोटर) जीत है जिसने राहुल को इसका मौका दिया है. मायावती शर्म दिवस मनाने से ज्यादा उनकी चिंता करतीं तो शायद हकीकत को ज्यादा नजदीक से समझ सकतीं.


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Saturday, June 13, 2009

यूपीए और हिंदी से उसका इत्तेफाक

सुधीर कुमार
आप् चाहे तो ट्रैफिक नियम तोड दीजिए और पकडे जाने पर थानेदार के सामने धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल दीजिए। अब भले ही वह प्राइमरी कक्षा में पढा कुत्ते/बिल्ली पर निबन्ध ही क्यों न हो, यकीन मानिए। पुलिसिया रौब आपसे डर जाएगा और आपको छोड देगा। वास्तव में आज भी हमारे देश में इस बात को मानने वाले लोगों की कमी नहीं जो समझदार उसे ही मानते हैं जो अंग्रेजी जानता है। और, देश की सरकार भी संभवत: अंग्रेजी से ही दिल का इत्तेफाक जोडती है, अगर नहीं तो भी कम से कम हिंदी से तो शायद नहीं ही जोडती. अगर ऐसा होता तो क्या यूपीए सरकार के नुमाइंदो (मंत्री ) में हिंदी भाषियों या हिंदी भाषी क्षेत्र की यूं उपेक्षा नहीं होती. देश में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश , बिहार, झारखंड, उत्तरांचल, छत्तीसगढ प्रमुख हिंदीभाषी प्रदेश हैं. लेकिन इस बार इनकी उपेक्षा हावी है. हाल फिलहाल तक मंत्रिमंडल को लेकर मची खींचतान के बीच इन प्रदेशों को मिले मंत्रियों की संख्या पर एक नजर डालते हैं :-
* यूपीए सरकार के पिछले दौर में मंत्रिमंडल पर छाए बिहार से फिलहाल न तो कोई कैबिनेट मंत्री है, न कोई राज्यमंत्री। कुल प्रतिनिधित्व शून्य। हालत यह हुई कि इस बार बिहार में जब ट्रेनें जलाने का कई दिन लंबा सिलसिला शुरू हुआ तो लगा ही नहीं कि केंद्र सरकार की इस सबसे बड़ी संपदा की चिंता करने वाला इस राज्य में कोई है।
* उत्तर प्रदेश से कैबिनेट मंत्री एक भी नहीं, राज्यमंत्री पांच। इनमें से भी दो के पास स्वतंत्र प्रभार। दो ऐसे हैं जो पहली बार ही संसद पहुंचे हैं।
* झारखंड और उत्तरांचल से एक-एक राज्यमंत्री, छत्तीसगढ़ का मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व शून्य।
* मध्य प्रदेश से दो कैबिनेट मंत्री और एक राज्यमंत्री, जबकि राजस्थान से इसका उलटा, यानी एक कैबिनेट मंत्री और दो राज्यमंत्री।
* हिंदीभाषी कहलाने वाले तीन अपेक्षाकृत छोटे राज्यों हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली का केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व ठीकठाक ही कहा जा सकता है,
* बीमारु राज्यों की अनदेखी : कभी बीमारू नाम से तिरस्कृत- बाकी सात राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल का केंद्र सरकार से रिश्ता नाम का ही जान पड़ता है। ये राज्य पूरे हिंदी क्षेत्र का कहीं बड़ा हिस्सा निर्मित करने वाले हैं. पिछली यूपीए सरकार में इन राज्यों से चार या पांच हाई-प्रफाइल कैबिनेट मंत्रियों समेत कुल 24 मंत्री हुआ करते थे, जबकि इस बार मात्र 15 मंत्री सरकार की शोभा बढ़ा रहे हैं जिनमें 3 कैबिनेट मंत्री, 2 स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री और बाकी 8 राज्यमंत्री हैं। इनमें भी हाई प्रफाइल सिर्फ कमलनाथ और खींचतान कर सी.पी. जोशी को माना जा सकता है।
* अब जरा अन्य राज्यों से आये मंत्रियों की संख्या पर नजर डालें तो होश ही उड जाते हैं. अकेले तमिलनाडु से 10, महाराष्ट्र से 9, पश्चिम बंगाल से 8 और केरल से 6 मंत्री।
* यानी लोकसभा में 149 सांसद भेजने वाले इन चार राज्यों से कुल 33 मंत्री और 209 सांसद भेजने वाले उन सात राज्यों से मात्र 15 मंत्री!
ऐसा नहीं है कि बीमारु राज्यों में यूपीए का प्रदर्शन खराब रहा हो. पिछली बार की तुलना में इन सातों राज्यों में यूपीए का चुनाव कुछ बेहतर ही गया है। 2004 में इस गठबंधन को यहां से कुल 59 सीटें मिली थीं, जो इस बार बढ़ कर 65 हो गई हैं। फिर सरकार में इन क्षेत्रों की हैसियत इस कदर कम हो जाने की वजह भला क्या हो सकती है? कहीं यह तो नहीं कि पिछली बार इन इलाकों में यूपीए का अर्थ कांग्रेस, आरजेडी और एलजेपी का गठबंधन हुआ करता था जबकि इस बार यह सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस है? अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस के लिए यह और खतरनाक संदेश हो सकता है. इस हिंदीभाषी क्षेत्र की जनता ने कांग्रेस में अपना विश्वास जताया है तो कांग्रेस को भी इन राज्यों पर ध्यान देना चाहिए था. आने वाले समय में यह अनदेशी यूपीए खासकर इस देश में लंबे समय से सरकार चलाने की अनुभवी पार्टी कांग्रेस को भारी पड सकती है. या फिर कांग्रेस आज भी पूर्व की तरह इन बीमारू राज्यों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए यहां नेहरू परिवार की उपस्थिति को ही पर्याप्त मानती है,
कहीं ऐसा तो नहीं है कि पार्टी और कई लोगों का राजनीतिक कद सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ने देती कि आगे चलकर वे कहीं पार्टी पर परिवार के वर्चस्व को चुनौती न देने लगें?
अब फिर बात अंग्रेजी की. अंग्रेजी की खासियत यही है कि वह दुनिया भर की भाषाओं से छांट-छांट कर शब्द चुनती है और अपने भण्डार में शामिल कर लेती है। यानि कि वह विरोध का बिगुल या छल प्रपंच की राजनीति से परे है लेकिन शायद कांग्रेस या यूपीए नहीं. शब्दों का निर्माण किसने किया किसने बनाए हैं ये शब्द यह तो हमें पता नहीं, पर अंग्रेजी भाषा जिस तरह दुनिया भर के शब्द अपने खजाने में शामिल कर रही है उससे तो यही लगता है कि शब्दों को ढूंढने के लिए अच्छे गोताखोरों और शिकारियों की जरू रत होती है। उधर हिन्दी के क्या हाल होते जा रहे हैं। यह तो भला हो इस देश के करोडों लोगों का, जिन्होंने अपने दम पर हिन्दी को जिला रखा है, वरना हमारे हुक्मरानों और अफसरों ने तो हिन्दी को सौतन की बेटी बनाने में कसर नहीं रखी थी। आज भी यह कहने वालों की कमी नहीं कि अंग्रेजी ही इस देश का भला करेगी। कांग्रेसनीत यूपीए ने भी शायद इसी नीति पर चलने में विश्वास कर रही है. विदेशियों की तो यह मजबूरी है कि न चाहते हुए भी उन्हें भारत की आज तरफ देखना पड रहा है. और, भारत को बगैर हिन्दी के स्वीकार ही नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि पूरी दुनिया में हाल के नस्लवादी हमलों के बावजूद भारतीयों की मेधा की पहचान पर किसी भी प्रकार का संकट नहीं आया है.
जबकि फिरंगियों/विदेशियों यहां तक कि नस्लवादी हमलों वाले देशों में भी भारतीय पहचान हिंदी के महत्व को समझ लिया गया है, हमारे भारतीय हुक्मरानों को कब यह सलीका आयेगा कि वे राष्ट्रभाषा हिन्दी और उस क्षेत्र को महत्व दें. काश किसी भी सरकार ने ऐसा कभी सोचा होता तो हम बीमारु राज्यों हमारे का रोना न रोकर आज आंध्रप्रदेश, गुजरात जैसे अहिंदीभाषी क्षेत्रों जैसी तरक्की से दो-चार होते.


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Wednesday, June 10, 2009

फिर भी कलावती गरीब ही रहेगी

आप कलावती को तो जानते ही होंगे? नहीं... तो राहुल गांधी को तो जरुर जानते होंगे. देखा आपके चेहरा खिल गया ना. मैं जानता था कि आप राहुल गांधी को जरुर जानते होंगे। तभी तो आपके चेहरे की रौनक बढ गयी लेकिन जिस कलावती को आप नहीं जानते उसे राहुल गांधी जरुर जानते हैं। यह वही कलावती हैं जो समाज के बेहद निम्न तबके/दलित वर्ग से आती है और इसी कलावती के घर पर भोजन कर राहुल गांधी ने कांग्रेस के चेहरे की मुस्कान लाने की कोशिश की और उनका यह प्रयास सुफल रहा जब 15वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेसनीत यूपीए ने बाजी मार ली थी. चुनाव के बाद कांग्रेसनीत यूपीए की ताकत और मुस्कान तो बढी लेकिन नहीं बदली तो कलावती की किस्मत और उसके चेहरे की समयपूर्व झुर्रियां. आज भी उसके चेहरे पर गहन अवसाद की छाया नजर आती है जिसको राजनीति का राहुल रुपी तेज भी नहीं बदल सका.
खैर, बात कलावती की तो बतो दें कि वह महाराष्ट्र के एक जिले की रहने वाली बेहद गरीब महिला है। वैसे तो वह बडी नाम बन चुकी है क्योंकि उसकी चर्चा संसद में दो बडे राजनेताओं द्वारा जो की गयी। अब तो वह जाना पहचाना नाम बन चुकी है सो आपको पता होना चाहिए था. जाना पहचाना नाम बन जाने के बावजूद कलावती की किस्मत ने करवट नहीं बदली. वह भी तब जब संसद में पिछले साल राहुल ने कलावती का जिक्र कर भारत की गरीबी को रेखांकित किया था. ऐसा लगा था मानों अबकी बार कलावती और उस जैसे तमाम लोगों की गरीबी बस दूर हुई समझो. यही नहीं महिला आरक्षण पर चर्चा के दौरान भी लालू प्रसाद यादव ने कलावती, भगवती की चर्चा कर डाली. लालू ने इस बिल पर बोलते हुए कहा कि इसमें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे कलावती जैसी करीब महिलाएं भी संसद में आ सकें.
फिलहाल तो कलावती दिल्ली में हैं और गरीबों के लिए न्याय की उम्मीद कर रही हैं। दरअसल गरीबी भोलेपन के साथ ही नजर आती है। कलावती का भोलापन भी देखिए, उसका मानना है कि राहुल ने जो विश्वास दिलाया था वह एक दिन पूरा होगा, भले ही अब तक जो वादे उससे किए गये थे उस पर रत्ती भर भी अमल न हुआ हो। यह गरीबी इतनी भोली होती है कि आश्वासनों के सहारे सैकडों वर्ष् गरीबी में ही उम्मीदी के दीये के साथ के साथ् जिंदगी काट लेती है और इसे देश के नेता बखूबी समझते हैं.

वादे हैं वादों का क्या
राहुल ने कलावती को घर दिलाने का वादा तो कर दिया था लेकिन न तो उचित दिशानिर्देश दिये गये और न ही उसकी स्थिति में कोई सुधार ही हुआ है। कलावती यानि आम जनता जो सरकार चुनती है ताकि उसकी समस्याएं सुलझाईं जा सकें, का मामला यह साबित करता है कि एक बडे नेता द्वारा किया गया वादा एक साल बाद भी पूरा नहीं होता. इसके पीछे नौकरशाही रवैये को दोषी ठहराया जाता है जो हर बात को फाइल दर फाइल आगे बढाता है. वास्तव में अगर कहीं कमी है तो प्रतिबद़धता की और राजनीतिक/प्रशासिनक सुचिता की.
कर्ज में डूबी कलावती जैसी आम जनता जब अधिकारियों के पास जाकर अपनी समस्या बताती है तो अधिकारी भी ढेर सारे वादे करते हैं लेकिन ये वादे जैसे पूरे होने के लिए होते ही नहीं। उसे वादे के मुताबिक न तो घर मिलते हैं न ही गांव के लिए स्वास्थ्य केंद्र, और तो और गांव के बच्चों के लिए अंग्रेजी स्कूल तो आज भी एक बडा सपना है।
वास्तव में कलावती सिर्फ एक महिला नहीं बल्कि देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती है। उस जनता की जिसको हर पांच साल बाद लोक लुभावन नये नारों और वादों की घुट्टी पिलाई जाती है, उसको अचानक ही चांद की सैर और उन ख्वाबों को पूरा करने का सब्जबाग दिखाया जाता है, जो वह सैकडो वर्षों से देखता आ रहा होता है। भई मानना पडेगा इस राजनीतिक वायदों की घुट्टी को जिसको पीने के बाद आम जन धैर्य से अगले पांच सालों का इंतजार करती है, अगली बार यह घुट्टी पीने का।


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Tuesday, June 9, 2009

शायद मैं भटक गया हूं...

क्या तालिबान केवल पाकिस्तान में हैं और हम इससे वंचित हैं? शायद नहीं क्योंकि तालिबान एक विचारधारा है। एक ऐसी विचारधारा जो आधुनिकता से कोसों दूर किसी अंधेरी कोठरी में दम घुटने तक के लिए छोड़ जाती है। एक ऐसा अंधा कुंआ जिसमें सारी हकीकतों का गला घोट दिया जाता है। तालिबान एक ऐसा हथियार है जिसकी धार को तेजकर अमन-ओ-चैन का सिर कलम कर दिया जाता है। दकियानूसी सोच और नामर्दी की हद तक मर्दानगी दिखाने को अगर तालिबान कहा जाय तो कुछ गलत नहीं होगा। यह एक ऐसी सोच है जो विकास को न सिर्फ दूर से सलाम करती है बल्कि उसे सोच में आने से पहले ही दूर छिटक देती है। तालिबान को यह पसंद नहीं कि आवाम में एका रहे, खुशहाली पसंद लोगों के बीच माहौल जिंदादिली जैसा हो। उन्हें तो बस इससे मतलब है कि किस तरह से सीलन भरे कमरे के दमघोंटू माहौल में खुद का श्रेष्ठ (?) सत्ता की तरह से बनाये रखा जाय। दरअसल, जुल्म ढाने और बराबरी के हक की बात करने वालों को पंगु करने का उपकरण है तालिबान।
अभी हाल में मध्यप्रदेश के एक जिले में घोड़ी चढ़े दूल्हे को केवल इसलिए कथित उच्च वर्ग के ठेकेदारों और नुमाइंदों ने मरणासन्न स्थिति तक पीटा क्योंकि दूल्हा उनके वर्ग का नहीं था और घोड़ी चढ़ने की हिमाकत कर बैठा। मानों यह उसका हक न हो, कि वह एक सामान्य या निम्न तबके है कि उसका विरोध करने वाले उच्च तबके के थे और उन्हें इस बात की पूरी छूट थी कि भारतीय संविधान के आदर्शो की चिंदी-चिंदी कर डालें। किस बात का समाजवाद और कैसी आजादी। सोच भी क्या तालिबान से रत्ती भर भी कम। आज भी, जबकि हम चांद पर अपना अक्स छोड़ने की अंतिम प्रक्रिया में हैं, हमारे गांवों में अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग की महिलाओं के, जब तब अपनी मर्दानगी साबित करने के लिए उच्चवर्ग द्वारा पूरे गांव के सामने कपड़े खींच लिए जाता हैं। ऐसा लगता है मानों कौरव और उनकी सभा आज भी बेरोकटोक जीवित है। कौरवों की भरी सभ में द्रौपदी का चीरहरण वाला प्रसंग 21वीं सदी में प्रवेश कर जाने के बाद भी वर्तमान है। कौरव-पांडव युग में लोगों ने द्रौपदी के चीरहरण को देखकर सिसकारियां भरी होंगी या अफसोस जताया होगा, मुझे नहीं मालूम, लेकिन अब इतना तो समझ ही गया हूं कि वर्तमान में जब भी कोई दुःशासन बनकर किसी द्रौपदी का चीरहरण करता है तो लोगों की सिसकारियां ही निकलती हैं। अफसोस या संवेदना जैसा कुछ तो विलुप्त प्राय हो चुका है।
क्या ऐसी घटनाएं इस बात की ओर संकेत नहीं करतीं कि आज भी तथाकथित उच्च वर्ग की सोच में जरा भी फर्क नहीं आया है। क्या, उनकी सोच उन तालिबानियों की सोच से जरा भी इतर है जो पाकिस्तान में लोकतंत्र की कब्र खोदने में जुटे हुए हैं और जब भी कभी ‘लोक’ उनको रोकने की कोशिश करता है, दमघोंटू सीलन भरी मर्दानगी से उनके घुटने तोड़ दिये जाते हैं। जैसे, तुम दबे कुचले ही अच्छे लगते हो। और, हमारे यहां भी निम्न वर्ग का दबा कुचला होना ही विकास का आधार माना जाता है। 15वीं लोकसभा के गठन के बाद महिला आरक्षण बिल पर शरद यादव का जहर खा लेने का शगूफा छेड़ना भी इसी तालिबानी सोच का नतीजा है। कहने को तो वे खुद को महिलाओं की उन्नति का पक्षधर कहते हैं लेकिन इसका विरोध करने में वे सबसे आगे भी नजर आये जिनकी लकीर सपा प्रमुख मुलायम ने भी पकड़ी। आखिर ‘सर्वोच्च सत्ता’ पर ‘घूंघटदारी सत्ता’ को वे कैसे बर्दाश्त करें। देखने वाली बात तो यह होगी कि जिस आधार पर शरद यादव जैसे लोग इस बिल का विरोध कर रहे हैं, इसके पास होने के बाद अपने उस आधार को खुद पर लागू करते हैं या नहीं। भविष्य में होने वाले चुनावों में शरद यादव का लिटमस टेस्ट होगा और टिकट बंटवारे पर भी सबकी नजर रहेगी कि महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग पर वे खुद कितना अमल करते हैं।
खैर, मैं शायद भटक रहा हूं। पता नहीं मुझे क्या कहना था और मैं क्या कहे जा रहा हूं। शायद मैं खुद इस देश का सबसे बड़ा नपुंसक हूं कि आम लोगों को दबाने वालों का विरोध तक नहीं कर सकता। मैंने खुद को इतना कमजोर महसूस किया कि उससे उबरने को कलम को अपना साथी बनाने की कोशिश की लेकिन... यह कलम भी कमजोर ही निकली. ऐसी कलम की बिसात ही क्या जिसकी स्याही उसी कथित उच्चवर्ग के रहमोंकरम से भरी जाती हो जिसके खिलाफ खड़े होने के लिए हमने कलम का सहारा लिया। .... चलिए बहुत हो चुका, मैं पहले ही भटका हुआ था, ज्यादा बोला तो और, भटक जाऊंगा...


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Sunday, May 17, 2009

जनादेश में दिखी "जन" की ताकत

15वीं लोकसभा चुनाव में एक बार फिर लोकतंत्र की जीत हुई है और जनादेश-2009में जन ने अपनी ताकत दिखा दी। कांग्रेसनीत यूपीए के हाथ आई वोटर की इस ताकत ने बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों को धराशाई कर दिया है। क्या इस परिणाम को कांग्रेस के पक्ष में बिल्ली के भाग्य से छींका फूटने जैसी बात नहीं मानी जा सकती? या फिर वोटर के पास कांग्रेस के हाथ में अपना हाथ सौंप देने के सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं था?
इस चुनावपरिणाम को देश का बौद्धिक नेतृत्व रखने का दावा करने वाले वामपंथियों के मुंह पर वोटर का करारा तमाचा क्यों नहीं कहा जा सकता? और, आम आदमी का सबसे बड़ा हितैषी होने का खम ठोकने वाली भारतीय जनता पार्टी की नैतिक पराजय क्यों नहीं है? और, इस चुनाव परिणाम को ऐसे भी देखा जा सकता है कि भाजपा और कांग्रेस के झगडे में वोट लूटने के इंतजार में बैठी बसपा व सपा जैसी पार्टियों की उम्मीदों पर वज्रपात हो गया। अब इसके जो भी मायने निकालें जायें लेकिन वोटर ने सचमुच "जन" की परवाह न करने वालों की हवा निकाल ही दी है।
उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें तो इस जनादेश के निहितार्थ और भी तीखे रुप में सामने आ रहे हैं। अपने गुजरने से पहले सड़कों को पानी डलवाकर धुलाई करवाने वाली, चाटुकार अफसरशाही और बिना रीढ़ वाले सलाहकारों से घिरीं प्रदेश की मुखिया क्या इस जनादेश से कोई सबक लेंगी? कल्याण की दोस्ती के मकड़जाल में फंसे और जया प्रदा की लाज बचाने के लिए आजम खां तक को किनारे लगा बैठे मुलायम क्या इस जनादेश के संदेशों को पढ़ने की कोई कोशिश करेंगे? टिप्पणी लिखे जाने तक आजम खां ने पार्टी के संसदीय बोर्ड से इस्तीफा दे दिया है।
क्या इस जनादेश को समझ कर यूपी को अपना मठ मानने वाले भगवाधारी भाजपा "मठाधीश" बनने की बजाय देश की "जनता की पार्टी" बनाने की दिशा में कोई पहल करेगी?
वोटर ने तो अपना काम पूरा कर डाला है और इस जनादेश पर उत्तर प्रदेश की सारी जनता को जश्न मनाना चाहिए। जश्न इसलिए कि इस जनादेश में देश के सबसे अमीर उम्मीदवार पीलीभीत से कांग्रेस के वीएम सिंह की जमानत जब्त हो गयी तो पुरखों की गाढ़ी कमाई को पिछले कई महीनों से लखनऊ की जनता निछावर करते जा रहे अखिलेश दास गुप्ता का भी हाल बुरा ही कर दिया है। साफ संदेश हैं कि पैसे के बूते पर हर तरफ लहर का दावा करने के बाद भी आखिरी फैसला जनता के ही हाथ में है। उत्तर प्रदेश की जनता को जश्न इसलिए भी मनाना चाहिए कि इस जनादेश ने धन बल के साथ ही बाहुबल के भी चारो खाना चित कर डाला है। भारतीय संविधान में आस्था रखने वाले और समाज के नियम कानूनों में यकीन रखने वाले हर एक आदमी को क्या इस बात का जश्न नहीं मनाना चाहिए कि इस जनादेश ने वाराणसी में "गरीबों के मसीहा" कहे गए मुख्तार अंसारी को उनकी हैसियत बता दी है, क्या इस बात के लिए जश्न नहीं मनाया जाना चाहिए कि डीपी यादव, अफजाल अंसारी, रिजवान जहीर, अन्ना शुक्ला, अशोक चंदेल और अतीक अहमद जैसे कथित माननीय भी इस बार संसद की शोभा बढ़ाने से वंचित कर दिए गए हैं।
लेकिन चिंता करने की भी कई वजहे हैं। सबसे बडी चिंता पिछली सरकार की तरह इस सरकार में भी उत्तर प्रदेश को प्रतिनिधित्व से वंचित न होना पड़ जाए। पिछली बार राज्य की लगभग तीन चौथाई सीटों का प्रतिनिधित्व रखने वाली सपा और बसपा की बारी-बारी मदद से मनमोहन सिंह की सरकार पूरे पांच साल चल तो गई लेकिन उत्तर प्रदेश को सरकार में भागीदारी का सुख नहीं मिल पाया। इस बार जनादेश कांग्रेस के पक्ष में भले ही हुआ हो लेकिन उत्तर प्रदेश की तीन चौथाई जनता का प्रतिनिधित्व अभी भी उसकी पिछली सहयोगी पार्टियों के पास ही है। ऐसे में आने वाला राजनीतिक घटनाक्रम जैसा भी हो उत्तर प्रदेश को सत्ता में भागीदारी तो मिलनी ही चाहिए।
खैर जिस जय हो के नारे के कांग्रेस ने चुनाव अभियान की शुरूआत की थी, अब उसे वोटर की जय बोलनी चाहिए और जय बोलनी चाहिए लोकतंत्र की क्योंकि अंत में जन ने अपना जनादेश दे दिया है.


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जनादेश-2009 के स्पष्ट संकेत

सबसे पहला यह कि जनादेश-2009 मनमोहन सिंह और उनकी यूपीए सरकार पर जनता के विश्वास की ओर संकेत करता है। जनता यह स्वीकार नहीं कर सकी कि विश्वव्यापी आथिर्क मंदी से निपटने, परमाणु करार के देश हित में होने के बावजूद विपक्षियों ने चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस/यूपीए की सार्वजनिक आलोचना की गयी। और, सरकार को अक्षम साबित करने की कोशिश की जबकि जनता अपनी आंखों से देखती रही कि सरकार इन सभी मुद्दों से निपटने के लिए किस प्रकार कोशिश करती रही।
मतदाता के मन में मंदी से मुकाबले की बात जरुर थी और इसके लिए वह स्थायी सरकार चाहती थी। ऐसे समय में मतदाता जांची परखी सरकार भी चाहता था जो वह कांग्रेस को ही समझता है। आमआदमी को मनमोहन सहज, भले और ईमानदार पीएम लगते हैं.
जनता ने आक्रामक और अनर्गल प्रचार पसंद नहीं किया। यही कारण है कि चुनाव प्रचार के दौरान बेहद आक्रामक रुख अख्तियार करने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन को कितना नुकसान उठाना पडा। सीधे-साधे पीएम मनमोहन सिंह को बार-बार कमजोर बताने की भाजपा की रणनीति ने उनकी लुटिया डुबो दी। मनमोहन और यूपीए सरकार पर एनडीए के कडे प्रहार जनता की सोच से मेल नहीं खा सके।
यूपी के पीलीभीत में भडकाउ भाषण देकर अचानक की भाजपा के स्टार प्रचारक बन बैठे वरुण गांधी का सम्प्रदाय विशेष के प्रति अविश्वसनीय रुप से कडी टिप्पणी का नुकसान भी भाजपा को हुआ। इसको लेकर पार्टी में ही चुनाव परिणाम के बाद विद्रोह के स्वर उठने लगे हैं। मुख्तार अब्बास नकवी व शाहनवाज हुसैन ने साफ तौर पर कहा है कि यूपी और अन्य प्रदेशों में वरुण की वजह से मुस्लिम वोट खिसक गये।
चुनाव के दौरान एनडीए का लालक़ष्ण आडवाणी को पीएम के रुप में प्रोजेक्ट करना भी हार का कारण रहा। दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी के दौरान भी आडवाणी भाजपा के प्रमुख नेता के रुप में सामने आये लेकिन वाजपेयी की उदार छवि के चलते भाजपा अपने चरम पर रही। लेकिन जब 15वीं लोकसभा चुनाव में आडवाणी एनडीए के मुखौटे के रुप में सामने आये तो जनता ने आक्रामकता से तौबा कर ली। यह वही आडवाणी हैं जो गांधी नगर में चुनाव जीतने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना की आदमकद तस्वीर के साथ मुस्लिम एरिया में प्रचार करते नजर आये। जीतने के लिए इस घटिया तरीके को वर्ग विशेष के साथ आम जनता को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।
चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान राहुल गांधी युवाओं की आस्था के केंद्र के रुप में नजर आये। मतदाताओं ने उन्हें भावी पीएम के रुप में देखा और भविष्य में युवा वर्ग के लिए कुछ करने का जज्बा भी, लेकिन इन चुनाव परिणाम से यह नहीं कहा जा सकता कि यूपीए के पक्ष में लहर रही। इसे विकल्पहीनता के रुप में भी देखा जा सकता है। और, भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रुप में मजबूती से सामने नहीं आ सकी।
जहां तक उत्तर और दक्षिण में अलग रुझान की बात है तो यूपी में चतुष्कोणीय मुकाबला था और लोगों ने भ्रम में पडने की बजाय गांधी परिवार पर भरोसा किया। राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी में उन्हें नयापन दिखा।
इस चुनाव में मतदाता ने क्षेत्रीय दलों के दंभ और अकड को नकार दिया। जनता ने उन्हें ब्लैकमेलिंग करते हुए पूरे साढे चार साल देखा और ऐन चुनाव के समय यूपीए से अलग होना उन्हें पसंद नहीं आया। वैसे इस चुनाव से क्षेत्रीय दलों के लोस चुनावों में पराभव के दौर के रुप में भी देखा जा सकता है।
वामदलों की अपने गढ पश्चिम बंगाल और केरल में शमर्नाक शिकस्त भी कुछ यही कहानी कहती नजर आये। परमाणु करार मुद्दे पर पूरे देश ने उनकी नौटंकी देखी थी। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण के मामले में भी उनकी तानाशाही पश्चिम बंगाल की जनता ने देखी और उनके रवैये को सिरे से नकार दिया।
और अंत में,
जनता ने एक बार फिर एकदल पर विश्वास जताने का संकेत दिया है। इसका तात्पर्य है कि भाजपा को अब भी चेत जाना चाहिए और नकारात्मक प्रचारों, अनर्गल टिप्पणियों से बचना चाहिए ताकि वह कांग्रेस के समानांतर खडा हो सके। एक मजबूत विपक्ष के होने से सत्ता पक्ष के तानाशाह होने का खतरा नहीं रहता.


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Friday, May 15, 2009

.... कि बंद आंखों से वे दुनिया को देखते हैं

हमारे पडोसी देश पाकिस्तान की हालत पर अब कुछ तरस सा आने लगा है. बंद आंखों से दुनिया को देखने वाले इस देश को और देशों की शांति और सुशासन शायद रास नहीं आती है और कभी तालिबानियों तो कभी आतंकियों के माध्यम से इसे साबित भी करता रहा है. उसके खुद के घर में आग लगी हुई है और पूरा देश उस आग में जो कि खुद उसी के द्वारा लगाई गयी है, झुलस रहा है. आम लोगों का जीना मुहाल हो गया है और स्वात घाटी से पलायन ही सारी कहानी बयां कर जा रही है. रोज अखबारों में वहां की शांति और सुशासन की कलई खुल रही है लेकिन उसे इससे इत्तेफाक कहां?
हाल ही में आईसीसी ने पाकिस्तान से विश्वकप क्रिकेट की मेजबानी छीन ली तो वहां के हुक्मरानों को जैसे आग लगी और खुद पीसीबी आक्रामक हो उठा. वे पूरी दुनिया को यह जतलाने की कोशिश करने में जुटे हुए हैं कि अगर पाकिस्तान के हालात ऐसे नहीं हैं कि वहां क्रिकेट का महाकुंभ नहीं लग सकता तो भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश के हालात भी इसकी गवाही नहीं देते. आईसीसी के पूर्व अध्यक्ष पाकिस्तान के अहसान मनी तो इसके लिए सीधे ही भारत को दोषी ठहरा रहे हैं. वैसे दूसरे “अहसानों” की पाक में कमी नहीं है. विश्वकप की मेजबानी के लिए अपने घर में माहौल न होने के बावजूद पीसीबी का सही जगह होने का दावा करना हास्यास्पद ही है और रवैया काफी कुछ अपनी सरकारों जैसा ही. भारत में कत्लेआम मचाने के लिए आतंकवादियों को शह देने वाला पाक और उसकी सेना, गुप्तचर एजेंसी आईएसआई पूरी दुनिया को यह बताने से नहीं चूकते कि वे खुद ही आतंकवाद ग्रसित देशों में हैं. दरअसल ऐसा कर वह अमेरिका से मिलने वाली सहायता राशि गंवाना नहीं चाहता और अपनी राजनीतिक रोटियों को जलते हुए नहीं देखना चाहता. पाकिस्तान का राजनीतिक आधार कुछ ऐसा है कि सत्ता पर काबिज होने के लिए अपने बडे भाई भारत का विरोधी तो होना ही होगा. संवदनाओं को जेहाद के माध्यम से भडकाकर वे जिस पाकिस्तान की कल्पना करना चाह रहे हैं क्या वह तरक्कीपसंद नुमाइंदों की पहचान कही जा सकती है?
जिस देश ने सदियों पुराने शरीयत को स्वात घाटी (अघोषित रुप से तो कई अन्य जगहे भीं) में मान्यता देकर तालिबानियों के चश्में से दुनिया को देखने और दिखाने की कोशिश की हो उसे तरक्की पसंद देश की संज्ञा कैसे दी जा सकती है। खुद अपना दामन बचाने के लिए वहां के राजनीतिज्ञों ने जिस तालिबान का सहारा लिया क्या उससे यह आशा की जा सकती है कि अमेरिकी दबाव में वह तालिबानियों पर आक्रमण कर उसे नेस्तनाबूद करने की इक सही कोशिश भी करेगा। जब मुंबई में कुछ महीनों पूर्व हुए आतंकी हमले में सैकडों बेगुनाहों का खून पानी की तरह बहा दिया गया था और जब इस दुस्साहसिक हमले में पाकिस्तान का साफ हाथ नजर आया तो पहले इनकार और फिर हमले में पकडे गये एकमात्र आतंकी अजमल कसाब के खुद यह बयान देने कि वह पाकिस्तान का नागरिक है, पाक हुक्मरान सकते में आ गये थे। कसाब के खुलासे के बाद कि मुंबई के समुद्री तटों तक पहुंचने में पाक सेना ने भी मदद की थी, लीपापोती करने में जुट गया था पाक। यहां तक कि उसे माता-पिता को डराया धमकाया गया, लश्कर-ए-तइबा के जिस आतंकी अब्दुल रहमान लखवी को कसाब ने अपना आका बताया, दुनिया को दिखाने के लिए उसे घर में ही नजरबंद किया गया, जहां से वह लापता हो गया। यह खबर पाक मीडिया ने ही दी। क्या इससे पाक का यह दोगलापन सामने नहीं आया कि मुंबई हमलों में पाक का हाथ नहीं है और फिर लखवी को कैद करने की भी जरुरत आन पडी। लापरवाही तो खैर पाकिस्तान का चेहरा ही है। शायद वह यह नहीं सोच रहा कि इस आग में एक दिन पाकिस्तान के अस्तित्व पर भी संकट उठ खडा होगा। वैसे यह बात पाकिस्तान के एक उपन्यासकार और राजनीति की गहरी समझ रखने वाले व्यक्ति ने भी हिंदुस्तान के एक शीर्ष दैनिक में एक लेख के माध्यम से उजागर किया है.
खैर, बात क्रिकेट की,
पीसीबी की ओर से यह बयान लगातार जारी हो रहे हैं कि भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश में स्थिति विश्वकप कराने जैसी नहीं है. वहां के माहौल खेल आयोजित कराने जैसे नहीं हैं. चलो हम मान भी लें कि पीसीबी सही कह रहा है तो फिर उसने जुलाई के बाद श्रीलंका में अपनी क्रिकेट टीम भेजने के लिए वह राजी कैसे हो गया. क्या यहां पर उसका दोमुहापन उजागर नहीं होता. दरअसल पाक नहीं चाहता कि भारत को विश्वकप आयोजन का श्रेय मिले. हालात का मुद्दा तो दुनिया को असल हकीकत से दूर ले जाने का प्रयास है. वैसे पाकिस्तान जरा यह तो बताये कि श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला कहां पर हुआ, भारत में, बांग्लादेश में या श्रीलंका में?
खैर पाकिस्तान क्या सोच रहा है इससे हमें कोई फर्क नहीं पडना चाहिए लेकिन उसकी सोच की शुरुआत और अंत भारत से ही होता है तो जरुर सोचने वाली बात है। पाक से इतर भारत की बात करें यहां के राजनीतिज्ञों में इस बात की प्रतिबद्धता नजर नहीं आती कि आतंकवादियों के खिलाफ सही कार्रवाई भी होनी चाहिए. उनके लिए तो यह मुद्दा केवल वोट खींचने तक ही सीमित है.

वैसे तरस तो हमें खुद पर भी आने लगा है,
आखिर हमारी सोच भी तालिबान जैसी क्यों नहीं है---
हम तालिबान को जी भरकर कोसते हैं क्योंकि वे लड़कियों के स्कूल जलाते हैं, हम उन्हें नामर्द कहते हैं। वे कोड़े बरसाते हैं तो हम उन्हें ज़ालिम कहते हैं। वे टीचर्स को भी पर्दों में रखते हैं , हम उन्हें जंगली कहते हैं।
हमारी सोच तालिबानी क्यों नहीं-
- क्योंकि हम हमारी संस्कृति और इज़्ज़त की रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं।
- क्योंकि हम यह सुनते ही उबल उठते हैं कि जाट की लड़की दलित के लड़के के साथ भाग गई। उन्हें ढूंढते हैं , पेड़ों से बांधते हैं और जला डालते हैं ... ताकि संस्कृति बची रहे।
- क्योंकि इस काम में लड़की का परिवार पूरी मदद करता है , क्योंकि उसके लिए इज़्ज़त बेटी से बड़ी नहीं।
- क्योंकि हम उस समय भन्ना उठते हैं , जब लड़कियों को छोटे - छोटे कपड़ों में पब और डिस्को जाते देखते हैं। फौरन एक वीरों की सेना बनाते हैं। सेना के वीर लड़कियों की जमकर पिटाई करते हैं और उनके कपड़े फाड़ डालते हैं।
- क्योंकि जिन्हें संस्कृति की परवाह नहीं , उनकी इज़्ज़त को तार - तार किया ही जाना चाहिए। उसके बाद हम ईश्वर की जय बोलकर सबको अपनी वीरता की कहानियां सुनाते हैं।
- क्योंकि जो रेप के लिए लड़की को ही कुसूरवार ठहराते हैं क्योंकि उसने तंग और भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे।
- क्योंकि हम अपनी गर्लफ्रेंड्स का mms बनाने और उसे सबको दिखाने में गौरव का अनुभव करते हैं और हर mms का पूरा लुत्फ लेते हैं।
- क्योंकि यह सब करने के बाद हम बड़ी शान से टीवी के सामने बैठकर तालिबान की हरकतों को ' घिनौना न्याय ' बताकर कोसते हैं और अपनी संस्कृति को दुनिया में सबसे महान मानकर खुश होते हैं।


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Friday, April 10, 2009

सलीम की जिद 'संवैधानिक' कैसे?

इसमें कोई दो राय नहीं कि भोपाल के निर्मला कान्वेंट हायर सेकंडरी स्कूल के एक छात्र मोह6मद सलीम की दाढ़ी रखने को अपना संवैधानिक अधिकार बताने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कंडेय काटजू की टिप्पणी और फैसला संवैधानिक एवं सांप्रदायिक संबंधों के इतिहास में लंबे समय तक ध्वनित होता रहेगा। सलीम ने याचिका में दाढ़ी रखना को अपना संवैधानिक अधिकार बताया जिस पर स्कूल ने ऐतराज जताया। सलीम के संवैधानिक अधिकार के दावे को ठुकराते हुए जस्टिस काटजू ने तीखी टिप्पणी की- 'हम इस देश में तालिबान नहीं चाहते। अगर कल कोई छात्रा बुर्के में आने का अधिकार जताएगी तो क्या हम इसकी इजाजत दे सकते हैं?
उनकी इस टिप्पणी पर आपत्ति होनी थी, हुई भी। बिल्कुल शा4दिक अर्थ के आधार पर जस्टिस काटजू से असहमत होने की पूरी गुंजाइश भी है। यह जरूर कहा जा सकता है कि उन्हें 'तालिबान' श4द का प्रयोग नहीं करना चाहिए था, 1योंकि यह जरूरी नहीं कि सभी दाढ़ी वाले कट्टरपंथी या बंदूकधारी हों। अलगाववादी होने के लिए भी दाढ़ी होनी जरूरी भी नहीं। ढाका में मुस्लिम लीग की जिन 35 लोगों ने परिकल्पना की थी, उनमें चंद लोगों के ही चेहरे पर दाढ़ी थी। पाकिस्तान के आध्यात्मिक जनक अल्लामा इकबाल और कायदे आजम मोह6मद अली जिन्ना, दोनों ही दाढ़ी नहीं रखते थे। पाकिस्तान में तालिबानीकरण की शुरुआत करने वाले जनरल जिया उल हक के भी दाढ़ी नहीं थी। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान आंदोलन के विरोधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डॉ। जाकिर हुसैन दोनों ही दाढ़ी वाले थे। अभी हाल में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की भारतीय मुस्लिमों पर की गयी टिप्पणी पर बेहद कड़ा जवाब देकर सुर्खियों में आये देवबंद के मौलाना मदनी भी बड़ी दाढ़ी रखते हैं, लेकिन उन्होंने साथ दिया कांग्रेस का।

भारत में ऐसी जिद क्यूँ
लेकिन, जस्टिस काटजू की टिप्पणी का शा4दिक अर्थ ही 1यों? प्रतीकात्मक अर्थ 1यों नहीं? दाढ़ी और बुर्का तो कुछ बातों और विचारों के प्रतीक हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सरहदी सूबे व बलूचिस्तान के हिस्सों में तालिबान ने तय कर रखा है कि कोई महिला सिर से पांव तक जिस्म को ढके बगैर बाहर नहीं निकलेगी, पुरुष दाढ़ी रखेंगे और ऊंचा पाजामा पहनेंगे। यकीनन यह पाकिस्तान के तालिबानीकरण का संकेत करता है और जो उनके इस फरमान को नहीं मानता उसे कोड़े खाने को तैयार रहना पड़ रहा है। अभी हाल में कई अखबारों में महिलाओं और पुरुषों की कुछ ऐसी ही तस्वीरें प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। अब ऐसे में अगर भारत में कोई दाढ़ी रखने की जिद करे तो 1या अर्थ निकाला जाए?
कॉमन सिविल कोड के पीछे की भावना
अब बात मोह6मद सलीम की। उन्होंने दाढ़ी रखने को संवैधानिक अधिकार का दावा किया। उनकी इस अपील पर 'कॉमन सिविल कोड' पर एक नजर डालना जरूरी हो जाता है। संविधान निर्माताओं ने इसकी जरूरत महसूस की थी, लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास था कि इसे थोपना मुनासिब नहीं होगा। यही कारण है कि इसे नीति निर्देशक सिध्दांतों में रखा गया। कॉमन सिविल कोड की इच्छा के पीछे यह भावना थी कि धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को छोड़कर बाकी सभी मामलों में भारत के सभी नागरिक समान जीवन संहिता का पालन करेंगे। 1या इस दृष्टिकोण से नितांत सार्वजनिक स्कूलों में छात्रों को ड्रेस की ऐसी छूट दी जा सकती है। अगर ऐसा हुआ तो स्कूल मदरसों और गुरुकुलों की संस्कृति की खिचड़ी बन जायेंगे।
जिद पर क्यूँ अड़ा नाबालिग सलीम
मोह6मद सलीम का दावा कॉमन सिविल कोड की प्रक्रिया को अवरुध्द करता है। पर सवाल यह भी कि एक लगभग नाबालिग बच्चा ऐसी जिद 1यों कर रहा है और इसे मनवाने के लिए संविधान की दुहाई देने की बात उसके जेहन में आई तो कैसे? कहीं इसके पीछे काल्पनिक असंतोष से उपजा अलग पहचान कायम करने का भाव तो नहीं काम कर रहा। ईरान में शहंशाह रजा पहलवी ने अमेरिका का दामन थाम कर देश के आधुनिकीकरण का रास्ता अपनाया तो उनके विरोध में लोग दाढ़ी रखने लगे और महिलाएं बुर्का पहन कर निकलने लगीं थीं। अयातुल्ला खुमैनी की इस्लामी क्रांति के बाद महिलाएं विरोध जताने के लिए जींस और टॉप में सड़कों पर आने लगीं, जिन्हें नियंत्रित करने में धार्मिक पुलिस को परेशान होना पड़ा।
सेकुलर उपायों से निकलेगा हल
देश के मोह6मद सलीमों को यह समझने और समझाने की जरूरत है कि उनकी परेशानियां दाढ़ी रखने या ऊंचा पाजामा पहनने से नहीं दूर हो सकतीं। विविधताओं वाले इस भारत देश में उनकी अपनी धार्मिक-सामाजिक पहचान के लिए तो जरूर जगह रहेगी, लेकिन इस पहचान के ऊपर धर्मनिरपेक्ष अखिल भारतीय पहचान को हमेशा स्वीकार करना पड़ेगा। आज एयरफोर्स में एक अधिकारी ने दाढ़ी रखने के अधिकार की मांग की है, कल कोई यह मांग भी कर सकता है कि हमें पुरातन सैनिकों की तरह रहने की अनुमति दी जाए। ऐसे में आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिकल्पना का 1या होगा। वास्तव में मुसलमानों में शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी की समस्याएं से1युलर हैं और उनका हल भी सेकुलर उपायों से ही निकल सकता है। दाढ़ी और बुर्के से शिक्षा और रोजगार के मसले हल नहीं होते। सेकुलर समस्याओं का हल से1युलर उपायों से ही निकलेगा।

(सहयोग - टाईम्स ऑफ़ इंडिया)


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Tuesday, March 31, 2009

बेकाबू हो चुके हैं पड़ोस के हालात

पाकिस्तान में लाहौर में एक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर हुए आतंकी हमले से यह जाहिर हो चुका है ​कि पाकिस्तान में हालात पूरी तरह से बेकाबू हो चुके हैं। श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमले के बाद भी पाक सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, दुनिया को दिखावे के लिए नेताओं के बयान भी आते रहे लेकिन पिछले एक महीने के भीतर चार बड़ी आतंकी वारदातें कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। इस सरकार को इससे कोई मतलब नहीं ​कि रावलपिंडी में होटल के पास विस्फोट में कितने मारे जाते हैं या फिर खैबर की मस्जिद में नमाजियों पर किस कदर कट्टरपंथियों का कहर टूटा। पाक सरकार को इससे कोई मतलब नहीं क्योंकि वह कट्टरपंथियों के हाथों का खिलौना बन चुकी है.
दुनिया की सबसे खूबसूरत स्थानों में एक स्वात घाटी में उनके कठमुल्लाई फरमान के आगे झुकते हुए शरीयत को मान्यता देने के बाद तालिबानों के हौंसले ​कितने बुलंद हुए, यह ​दुनिया से छिपा नहीं है. श्रीलकाई टीम पर हमला इसी का परिणाम रहा. पाकिस्तान के झंडाबरदार गद्दीनसीन कभी यह नहीं सोचते कि जिस आग को वे हवा देकर खुद की कुर्सी को कायनात की सीढ़ी बनाने पर तुले हैं, उसी की तपिश एक दिन पूरे देश को ले डूबेगी.
लेकिन क्या हम इतना कहकर ही सब कुछ खत्म कर लेंगे. क्या हमारे पड़ोस पाकिस्तान में इस तरह की घटनाओं को हम केवल उसका आंतरिक संकट मात्र मानकर निश्चिंत होकर बैठ सकेंगे. मुंबई में 26 नवंबर को हमले के बाद आतंकवादियों की कायराना हरकते लगातार बढ़ रही हैं. दरअसल आतंकियों के निशाने पर भारत और पाक दोनों ही हैं. पाकिस्तान की लगाई यह आग अगर पाक को नुकसान पहुंचाती है तो उसकी लपटे भारत को भी झुलसायेंगी इसमें संदेह नहीं है. आखिर क्या कारण है ​कि इस दौरान जबकि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों का कहर टूट रहा है, जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा क्षेत्र में आतंकवादियों की घुसपैठ भी अप्रत्याशित रुप से बढ़ गयी है. कहीं पाकिस्तान के इरादे कुछ और तो नहीं.
बहरहाल, आज दक्षिण एशिया में कट्टरपंथ की आग जिस तरह फैलती जा रही है वह न केवल पाकिस्तान बल्कि पूरे विश्व समुदाय के ​लिए चिंता का विषय होना चाहिए. लेकिन खुद को दुनिया का नेता मानने वाला अमेरिका इस संकट को भी केवल अपने नफे नुकसान के नजरिए से देखने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा. बराक ओबामा ने जो शब्जबाग दिखाये थे उसकी असलियत अब सबके सामने आ रही है. लेकिन वह भी बुश के नक्शेकदम पर ही जाते दिख रहे हैं. पिछले दिनों ओबामा ने पाक को डेढ अरब डॉलर की वार्षिक सहायता देने की घोषणा की और पहले की ही तरह उसे सैन्य सहायता देने का संकेत भी दिया. दरअसल अल कायदा के खिलाफ अभियान में पाकिस्तान का सहयोग उनकी रणनीतिक मजबूरी बन गयी है. ऐसे में और देश आतंकी हमलों से जूझ रहे हैं तो जूझते रहें.
आखिर क्या कारण है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा कई बार यह तथ्य उजागर करने के बावजूद कि आईएसआई आतंकवादियों को संरक्षण और बढ़ावा दे रही है, अमेरिकी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे रही. उसने तो अपनी आंख पर भी पट्टी ही बांध रखी है ​कि उसे यह दिखाई नहीं देता कि आतंक के खात्मे के नाम पर पाकिस्तान को दी जा रही मदद के बावजूद आतंकी हमलों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही है. तालिबानों की बढ़ती ताकत से उसका कोई लेना देना नहीं है. निश्चित रूप से अमेरिका को भी अपना वह चश्मा बदलना होगा जिससे उसे आतंकवाद सिर्फ दुनिया के उसी हिस्से में नजर आता है, जहां उसके सैनिक घिरे होते हैं।
पाकिस्तान को उसके हुक्मरानों की दोहरी नीति (आतंकवाद को दूसरों के खिलाफ इस्तेमाल करने और अपने मामले में विलाप करने) की कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी दोहरे रवैये ने आज ऐसी हालत पैदा कर दी है कि पाकिस्तान की सत्ता आतंकवादियों के सामने इस कदर असहाय नजर आती है। इस तेजी से फैल रही आग पर काबू पाने के लिए वहां के राजनीतिक नेतृत्व को अपनी दुविधा से उबरना होगा। अपने पूर्वाग्रह छोड़ कर पाकिस्तान और भारत मिलकर इसका मुकाबला कर सकते हैं।


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Tuesday, March 17, 2009

जबान पर पर लगाम रखें वरुण

बीजेपी के लोकसभा उम्मीदवार वरुण गांधी के मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ भाषण से बैकफुट पर आई पार्टी ने अपने सभी उम्मीदवारों को सलाह दी कि वे अपने चुनावी भाषणों में जबान पर लगाम रखें। मेनका गांधी और दिवंगत संजय गांधी के बेटे वरुण के भड़काऊ भाषण के बारे में पूछे जाने पर पार्टी के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा, 'पार्टी ने अपने सभी उम्मीदवारों से कहा है कि वे देते वक्त जबान पर लगाम रखें। पूरी तरह से संयम से काम लें।' यह पूछे जाने पर कि वरुण के खिलाफ क्या पार्टी ऐक्शन लेगी? इस पर उन्होंने कहा की हम इस तरह के विचारों से सहमत नहीं हैं।' बीजेपी उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने भी वरुण के भाषण की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा, 'ऐसे विचारों की पार्टी में कोई जगह नहीं है।'
गौरतलब है कि वरुण गांधी ने एक चुनावी रैली में कहा था, 'यह हाथ नहीं है। यह कमल है। यह ...का सर काट देगा, जय श्रीराम।' एक अन्य सभा में उन्होंने कहा, 'अगर कोई हिंदुओं की तरफ उंगली उठाएगा या समझेगा कि हिंदू कमजोर हैं और उनका कोई नेता नहीं हैं, अगर कोई सोचता है कि ये नेता वोटों के लिए हमारे जूते चाटेंगे तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूं कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा।' वरुण ने कहा, 'जो हाथ हिंदुओं पर उठेगा, मैं उस हाथ को काट दूंगा।'
वरुण गांधी ने देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा, गांधीजी कहा करते थे कि कोई इस गाल पर थप्पड़ मारे तो उसके सामने दूसरा गाल कर दो ताकि वह इस गाल पर भी थप्पड़ मार सके। यह क्या है। अगर आपको कोई एक थप्पड़ मारे तो आप उसका हाथ काट डालिए कि आगे से वह आपको थप्पड़ नहीं मार सके।


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Saturday, March 14, 2009

कहीं फ़िर बेवकूफ न बनें

पांच साल तक जनता के बीच से नदारद रहे वो चेहरे, अब एक बार फ़िर जननायक होने की दुहाई देंगे क्योंकि एक बार फ़िर चुनावी रणभेरी बज चुकी है। और मौका है एक बार फिर से बेवकूफ बनने का। साल-दर-साल ये कहानी दोहराई जा रही है। इस बार भी कोई नई नही है। बिसात वही होगी, कुछ मोहरे बदल दिए जाएंगे। बाकि का काम जनता ख़ुद बा ख़ुद कर लेगी। उसकी आंखों में फिर से पट्टी बंध जाएगी। सत्ता के जादूगर रात के अंधेरे में घिनौने खेल-खेल कर सुबह, दोपहर निपट सफेद चोला पहन कर जनता को अपने रहस्यमयी व्यक्तित्व से मूर्ख बना जायेंगे।
सत्ता बेईमानो के चंगुल में है और अपराधी ही नेता बने बैठे हैं। क्या कोई सत्ता से बेईमानों को बाहर करने का रास्ता दिखा पाएगा? या फिर हम चिरकाल तक अयोग्य नेताओं से आस बांधे रहेंगे। ईमानदारों के लिए सत्ता में जगह नहीं और बेइमानों के लिए जगह की कमी नहीं। हमारे देश में नेता रात के अंधेरे में रावण हैं और दिन के उजाले में मर्यादा पुरूषोतम राम होने का दावा करते हैं। दोहरा चरित्र आज हिंदुस्तान को ऐसे दोहराव पर ले आया है कि समझ नहीं आता कि हम भारतीय होने का शोक मनाएं या गर्व करें।
ऐसी राजनीती में जितना दोष नेताओं का है उससे कहीं ज्यादा जनता का। जनता के खून पसीने के अरबों रुपये ये नेता अब कुर्सी के लालच में फूंक डालेंगे ओर जनता को आस होगी विकास की। हमें ऐसे नेता को पहचानना होगा। वैसे यह भी बेहद मुश्किल है क्योंकि बेदाग प्रतिनिधि को कोई पार्टी पूछती ही नही है। बेइमानों के लिए कसीदे गढ़ने में मीडिया का जवाब नहीं। किसी भी भ्रष्ट को छाप दीजिए बस अगले चार दिन बाद वही बेइमान किसी दल का भावी उम्मीदवार होता है। सच यह है कि हम लोग अब भ्रष्टाचार को पसंद कर रहे हैं ओर भ्रष्टाचारी हमारे आदर्श बन चुके हैं।
वास्तव में एक नई क्रांति की ज़रूरत आन पड़ी है। ऐसी क्रांति जिसमे हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से योगदान करना होगा, अपने ऐसे जनप्रतिनिधियों को देश की कु-सेवा से दूर करने का। मुझे एक टीवी ऐड यद् आ रहा है जिसमे संदेश दिया जाता है की अगर हम वोट देने नही जातें हैं तो इसका मतलब हम सो रहे हैं।
मेरा कहना है की अगर हम बेईमानों, अपराधियों और देश को गर्त में ले जाने वाले सफेदपोश को अपना वोट दे रहे हैं तो इसका मतलब हम अभी चिर निद्रा में ही हैं, हमें अपने देश की चिंता ही नही है।


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Monday, March 9, 2009

और, मुशर्रफ जी ! जवाब मिल गया ना?

पाकिस्तान आग के ढेर पर बैठा है पर उसके हुक्मरान इसे स्वीकार करना नहीं चाहते। लेकिन वह दूसरों को नसीहत देने से बाज नही आता। पाकिस्तान के पूर्व प्रेजिडेंट, माफ़ कीजियेगा सेना के जनरल रहे परवेज मुशर्रफ इन दिनों हमारे देश के दौरे पर हैं। उनका दौरा एजुकेशनल है और मुशर्रफ जी कुछ लेक्च्रर वगैरह देने आए हैं। मगर भारत से खुन्नस ऐसी की एजुकेशनल टूर को भी कूटनीतिक रंग देने से नही चुके और भारतीय मुसलमानों को बरगलाने का प्रयास किया।
उन्होंने सोचा की वो जो भी कहेंगे धर्मं के आधार पर मुस्लिमो में उनकी छवि अच्छी होगी। दरअसल मुशर्रफ जी इतने नासमझ होंगे हमने सोचा नही था। भारतीय मुसलमान जानता है की हमारा हितैषी कौन है और अपने देश को कमज़ोर करने वालों को सबक किसे सिखाया जाता है। इसकी एक बानगी देखिये
राज्यसभा के सांसद और जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिन्द के नेता महमूद मदनी ने पाकिस्तानी नेता को साफ कर दिया कि उन्हें या उनके देश को भारत के मुसलमानों के बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। मुसलमान अपनी समस्याओं को सुलझाने में सक्षम हैं, हमें आपकी सलाह की जरूरत नहीं है। मुस्लिम नेता महमूद मदनी ने जब मुशर्रफ से यह बात कही, तो उनका चेहरा देखने लायक था। मदनी ने कहा कि यहां (भारत) या पाकिस्तान में अपनी टिप्पणियों से आप भारतीय मुसलमानों को बांटने की कोशिश मत कीजिए। पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ दिल्ली में एक प्रोग्राम में हिस्सा लेने आए थे। उनके भाषण के बाद मदनी ने अपनी बात कही। मुशर्रफ ने कहा था कि भारत के मुसलमान अलगाव में हैं और यह यहां आतंकवाद के कारणों में से एक है।
मदनी ने कहा कि आप पाकिस्तान की राजनीति शुरू मत कीजिए। ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए मदनी ने कहा कि जितनी पाकिस्तान की कुल आबादी है उससे ज्यादा मुसलमानों की आबादी भारत में है। आपको यह पता होना चाहिए। जब मुशर्रफ ने कहा कि वह इस बारे में जानते हैं तो मदनी ने कहा कि आप जानते हैं तो आपको यह भी पता होना चाहिए कि भारतीय मुसलमानों में अपनी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता है, हमें आपकी सलाह की जरूरत नहीं है।
मुशर्रफ को मदनी ने जो करारा जवाब दिया है उससे पाकिस्तान को समझ जाना चाहिए भारतीय मुस्लमान अपने देश को उनके नागरिकों से कही ज्यादा समझते हैं। आतंकवाद की आग आपने ख़ुद ही लगाई है और बुरी तरह झुलसने के बाद भी हवा देने में लगे हैं। तो आप ही उसमे जलिए न और अपने देश को नेस्तनाबूद होते देखते रहिये। हमें बरगलाने की कोशिश करेंगे तो जवाब देने से पीछे नही हटेंगे भारतीय मुस्लमान।


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Sunday, March 8, 2009

3/3 घटनाक्रम- तैरते सवाल

  • 25 मिनट तक सुरक्षा बलों और हमलावरों के बीच क्रॉस फायरिंग होती रही, लेकिन एक भी आतंकवादी न तो मरा और न ही घायल हुआ। जबकि पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि सुरक्षा में तैनात जवानों ने जवाबी कार्रवाई की।
  • घटना के फौरन बाद आसपास के इलाके को सील कर आतंकवादियों की तलाशी के लिए कोशिशें क्यों नहीं की गईं?
  • इतने लंबे वक्त तक गोलीबारी होने के बावजूद चंद कदम के फासले पर स्थित गुलबर्ग पुलिस स्टेशन से दूसरी टुकड़ी नहीं पहुंची। लिबर्टी चौराहे पर पिकेट ड्यूटी पर तैनात पुलिस वालों का भी कोई अता-पता नहीं था।
  • घटना से 24 घंटे पहले क्रिकेटरों की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे कुछ वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारियों का पंजाब के गवर्नर सलमान तहसीर ने तबादला किसके कहने पर किया?
  • जनवरी से ही श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला हो सकने की खुफिया जानकारी पुलिस के पास थी। इस जानकारी को श्रीलंकाई सुरक्षा अधिकारियों के साथ दौर से पहले शेयर क्यों नहीं किया गया?
  • पाकिस्तान और श्रीलंका की टीम एक साथ ही स्टेडियम के लिए रवाना होती थीं, फिर हमले के दिन पाकिस्तान टीम 5 मिनट देर से क्यों रवाना की गई।
  • पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान यूनुस खान के पास मैच से पहले किसका फोन आया था, क्या यूनुस के कहने पर ही बस को देर से रवाना किया गया?
  • बिना किसी सबूत के घटना के चंद घंटों के भीतर ही हामिद गुल और सरकारी मीडिया के कुछ हलकों में भारत के इन हमलों के पीछे होने का अंदेशा जाहिर किया गया। इस मसले पर पाकिस्तान की सरकार ने अपना रुख साफ करने में तीन दिन का वक्त क्यों लगाया?
  • श्रीलंका के स्पिनर मुरलीधरन के मुताबिक हमलावरों को हमारे प्रोग्रैम और रूट की पूरी जानकारी थी और इसमें अंदर का कोई आदमी शरीक था। फिर भी पाकिस्तानी सुरक्षा बल आयोजन से जुड़े लोगों से पूछताछ नहीं कर रही है।
  • लाहौर के पुलिस कमिश्नर के मुताबिक पुलिस की गाड़ी सिर्फ क्रिकेटरों की बस को एस्कॉर्ट करने के लिए थी। सुरक्षा के तिहरे चक्र को भूल भी जाएं तो भी क्या एक भी अदद टुकड़ी सुरक्षा के लिए तैनात नहीं की जा सकती थी?


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Wednesday, March 4, 2009

’पाक’ खेल पर ’नापाक’ निशाना

सुधीर कुमार
भद्रजनों का खेल माना जाने वाला ’पाक’ खेल क्रिकेट अब आतंकवादियों के ’नापाक’ निशाने पर आ चुका है और इसकी एक बानगी उसने बेहद कायराना अंदाज में पाकिस्तान में श्रीलंकाई टीम के खिलाड़ियों पर अंधाधुंध फायरिंग कर पेश कर दिया है। अपने जन्म के साथ ही कट्टरपंथियों की गिरफ्त में बुरी तरह जकड़ जाने वाले पाकिस्तान ने कभी इससे निकलने की कोशिश भी नहीं की और इन कट्टरपंथियों ने यहां की सरकार की नपुंसकता का फायदा उठाते हुए धर्म की आड़ में ’जेहाद’ को हिंसा से जोड़ दिया। नतीजा यह निकला कि पूरी दुनिया में यह देश उग्र आतंकवादियों की खैर-ख्वाह के रूप में जाना जाने लगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान की सभी सरकारों ने भारत में सभी धर्मो के लोगों के बीच एकता और प्रेम को अपनी आंखों की किरकिरी मानकर इन आतंकवादियों को बढ़ाया ही दिया। इस बेलगाम बढ़ावे का फायदा उठाकर आतंकवादियों ने पूरी दुनिया को अपने गिरफ्त में लेने की कोशिश की। शायद इन्हें अमन-चैन से नफरत सी हो, इसलिए पाकिस्तान से बेहतर पनाह इन्हें और कहां मिल सकती थी?
बहरहाल, श्रीलंकाई टीम पर अंधाधुंध हमला कर इन दहशतगर्दो ने शायद यही पैगाम देने की कोशिश की है कि हमें ’सामान्य’ जैसा कुछ भी गंवारा नहीं। हर कुछ हमें असामान्य ही चाहिए। और, यह असामान्यता उनके लिए खौफ, हिंसा, हत्या और व्यभिचार से इतर बिल्कुल भी न हो। शायद तभी तो जिस श्रीलंका टीम ने हिम्मत जुटाकर पाकिस्तान में खेलों की बहाली के पाक प्रयासों को बल देने की कोशिश की, उसी को अपनी बेखौफ और बेरोकटोक जिद का निशाना बना दिया।
मानो , तुम्हारे लिए क्रिकेट खेल है तो मरना-मारना हमारा खेल और हम पर कोई हावी हो जाये, बर्दाश्त नहीं।
जहां तक पाकिस्तान की बात है तो ऑस्ट्रेलिया , द. अफ्रीका और न्यूजीलैंड ने सुरक्षा इंतजामों को अपर्याप्त बताते हुए वहां जाने से इनकार कर दिया था। जब भारत ने भी जनवरी में प्रस्तावित अपना दौरा रद कर दिया तो श्रीलंकाई टीम ने हिम्मत जुटाई।
पाकिस्तान सरकार से अब पूछा जाना चाहिए कि आखिर किस आधार पर वह अन्य देशों द्वारा दौरा जारी रखने पर ज़ोर दे रहा था और सुरक्षा की गारंटी ले रहा था। उसके सारे दावों की पोल तब अब सामने आ ही चुकी है। सुरक्षा के प्रति लापरवाही इस कदर कि जिस बस से श्रीलंकाई टीम अपने होटल से लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम तक जाना था वह बुलेट प्रूफ तक नहीं थी। श्रीलंकाई टीम पर हुए हमलों में जिस तरह से सुरक्षा खामियां उभरकर सामने आईं हैं, भविष्य में अब कोई भी टीम पाकिस्तान में खेलने जाएगी, इसकी संभावना बिल्कुल भी नहीं है।
क्रिकेट टीम पर हमला इस महाद्वीप में पहली बार हुआ। सामान्य तौर पर अभी तक खिलाड़ियों को व्यक्तिगत धमकियां ही मिलती रहीं लेकिन कभी कोई हमला या वारदात नहीं हुई। भारत में सचिन तेंदुलकर, वीरेन्द्र सहवाग, महेन्द्र सिंह, गांगुली को समय-समय पर मारने की धमकियां दी गई लेकिन सुरक्षा इंतजामों के पुख्ता होने के कारण कभी प्रयास तक नहीं हो पाया। सामान्यत तौर पर आतंकी संगठनों ने कभी खिलािडयों या टीमों पर हमला नहीं किया। श्रीलंका पर हमले के साथ एक खतरनाक शुरुआत हो चुकी है कि अब खिलाड़ी अब सुरक्षित नहीं हैं। क्रिकेट संकट में है और आतंकी कभी भी कहीं भी घुसकर हमला कर सकते हैं ।
खिलाड़ियों पर हमला करने का सबसे खतरनाक उदारहण म्यूनिख ओलंपिक के दौरान इजराइल के एथलीटों पर हमले के रूप में सामने आया था तब लेबनानी आतंकवादियों ने पूरी टीम को बेरहमी से मार दिया था। हालाकि इजराइली गुप्तचर एजेंसी मोसाद ने बाद में ढूंढ-ढूंढ कर इस हमले के जिम्मेदार लोगों को मारा था। लेकिन खिलाड़ियों को आतंक का निशाना बनाने की शुरुआत हो गई थी।
आतंकियों के हमले के निहितार्थ:
  • अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान सरकार इस वक्त जिस तरह आतंकियों के खिलाफ कड़ा रुख अपना रही थी, वह कई कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आ रहा था। प्रतिक्रिया स्वरूप क्रिकेटरों को निशाना बनाया गया।
  • इस घटना के माध्यम से तालिबान व अन्य चरमपंथी संगठन अपना वर्चस्व दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, कि वे पूरे महाद्वीप या पाकिस्तान में कहीं भी बेखौफ हमले कर सकते हैं ।
  • जिस तरह यह हमला हुआ और इसके पहले मुंबई में आतंकी वारदात हो चुकी है।
  • भारतीय क्रिकेट टीम के लिए भी खतरा बढ़ गया है। अब टीम व उसके खिलाड़ियों की सुरक्षा व्यवस्था को और पुख्ता, और बढ़ाये जाने की तत्काल आवश्यकता है।
  • भारतीय गुप्तचर एजेंसियों को अब अपनी पड़ताल में खिलाड़ियों या टीम पर हमले का पक्ष भी शामिल करना जरूरी हो जायेगा।
  • इस बात की संभावना बलवती हो गयी है कि पाकिस्तान में संभवतः अगले कुछ सालों तक कोई मैच नहीं हो पायेगा।


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Friday, January 30, 2009

'फिजा' से कहीं उब तो नही गए 'चाँद!'



चन्द्रमोहन उर्फ़ चाँद मोहम्मद अचानक 'उनकी' दुनिया से लापता हुए तो फिजा ने नीद की गोलियां निगलकर खुदकुशी करने का प्रयास कर डाला। अभी महीने भर पहले चंद्रमोहन और अनुराधा बाली ने इसलाम धर्म अपनाकर शादी की थी। चंद्रमोहन चांद मोहम्मद बन गए थे, तो अनुराधा बाली फिजा। दोनों ने अपनी शादी की बात को सार्वजनिक करते हुए कहा था कि उन्होंने अपनी मोहब्बत को परवान चढ़ाने में जमाने की परवाह नहीं की। मगर ऐसा क्या हुआ की चाँद को फिजा से दूर-दूर भागना पड़ रहा है और फिजा को खुदकुशी करने का प्रयास करने की ज़रूरत आन पड़ी।

कहीं ऐसा तो नही भजनलाल का पुत्रमोह जाग उठा है और वे चन्द्रमोहन की वापसी की बाटजोहने लगे हैं।
चन्द्रमोहन ने कहा था कि वह बाली से प्यार करते हैं और साथ रहना चाहते हैं , फिर एक महीने बाद ही वह अचानक लापता क्यों हो गए ? अब वे फिजा से बात नहीं कर रहे हैं ? कोई बात तो है ? चर्चा है कि चंद्रमोहन अपनी दूसरी शादी के बारे में कोई राज छिपा रहे हैं। फिजा भी आशंकित हैं। उन्होंने कहा है कि चंद्रमोहन पर दबाव है। हालाँकि दबाव का खुलासा उन्होंने नही किया लेकिन उनके भाई कुलदीप विश्नोई पर अपहरण के आरोप जड़ दिए।

आज जबकि फिजा को अस्पताल से छुट्टी हो गई तो फिजा ने कल की नौटंकी से इतर कहा की उन्होंने खुदकुशी का प्रयास नही किया था और उनकी तबियत ख़राब हो गई थी। फ़िर भी सवाल जो जवाब मांग रहा है कि चाँद फिजा से दूर-दूर क्यों हैं? तबियत बिगड़ने के बाद भी चाँद फिजा को देखने क्यो नही आए?

कही ऐसा तो नही कि चाँद अब फिजा से उब गए हो और जो सत्ता सुख वो पूर्व में भोग चुके हैं उसकी याद आने लगी हो।
इस बीच एक तथ्य यह भी कि चंद्रमोहन ने मार्च, 2008 में अपनी सारी संपत्ति पहली पत्नी सीमा बिश्नोई और बच्चों के नाम कर दी थी। लोग इसका मतलब निकालने में लगे हैं। इसके अलावा चंद्रमोहन और अनुराधा बाली के बीच पिछले पांच सालों से जान - पहचान है। चंद्रमोहन के कहने पर ही बाली को हरियाणा का असिस्टेंट एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया था।

सम्भव है चंद्रमोहन को यह महसूस होने लगा हो कि जो रसूख राजनीति में है वो फिजा के साथ रहने में नही? या फ़िर वो 'फिजा' के प्यार से उब तो नही गए? हो सकता है इस्लाम धर्म उन्हें रास नही आ रहा था या होने को तो बहुत कुछ हो सकता है। हम कहा तक आकलन करते फिरेंगे।


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