Thursday, August 27, 2009

जसवंत-जसवंत पुकारती "साइकिल"

आज अचानक ही सालों पहले एक महानगर के फुटपाथ पर उत्सुकता भरी निगाहों से देख रहे लोगों के हुजूम के बीच 'गोमती चक्र' पत्थर बेचने की कोशिश कर रहे साधु का वेश धरे उस फुटपथिया दुकानदार के मुंह से बार-बार निकल रही पंक्तियां याद आ गईं,
''हीरा पड़ा बाजार में लख आएं-लख जाएं,
मूरख-मूरख चल दिये ज्ञानी लाये उठाएं।"
इस पंक्ति में साफ कहा गया है कि हीरे की पहचान ज्ञानी को ही हो सकती है। हम रोज जाने कितनी ही चीजों को निरर्थक, अनुपयोगी, कबाड़ समझकर फेंक देते हैं मगर कचड़ा बीनने वाले बच्चे उसी में कुछ ऐसा तलाश लेते हैं जो उनकी पेट की आग शांत करने में मदद देती है। रद्दी-कबाड़ा खरीदने वाले के यहां सारी रद्दियां मसलन पेपर, बोतल, प्लास्टिक और लोहे के पुराने सामान, फटेहाल जूते-चप्पल सब कुछ बिक जाता है।

मतलब यह है कि भारत दुनिया के उन देशों में शुमार है जहां कुछ भी बेकार नहीं समझा जाता। यहां पर पुरानी से पुरानी चीज खरीदने वाले मिल ही जाएंगे। वैसे भी अब तो एक्सचेंज का जमाना आ चुका है। आप यह समझ रहे होंगे कि यह मैं क्या लिखे जा रहा हूं और किस संबंध में बात करना चाहता हूं। दरअसल, मैं यहां यह बताना चाहता हूं कि इस देश में कुछ भी अनुपयोगी नहीं माना जाता। घिसी-पिटी, मार खाई वस्तुओं तक का उपयोग कर लेने वाले लोग मौजूद हैं। अब देखिये ना, इसका ताजा उदाहरण समाजवादी पार्टी की टपकती लार को देखकर ही मिल गया। जसवंत सिंह को मोहम्मद अली जिन्ना को महिमा मंडित करने और नेहरु-पटेल को देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराने पर भाजपा से धकिया कर बाहर कर दिया गया। पढ़े-लिखे विद्वान जसवंत सिंह का कोई कोई पुख्ता जनाधार हो सकता है, यह भाजपा समेत अन्य लोग भी बेहतर जानते हैं। अत: भाजपा को लगा कि जसवंत उनके लिए अनुपयोगी हो चुके हैं और इस अनुपयोगी प्राणी को बाहर कर अपना घर साफ कर लिया जाना चाहिए, जिसमें जिन्ना, महिमा मंडन के धब्बे लग गये हैं। मौका भी शुभ था, गणेशोत्सव के समय आखिर घर साफ भी तो होना चाहिए न।
अब जसवंत सिंह कहां राह तलाशते, अपनी पुस्तक में पंडित जवाहर लाल नेहरू पर अंगुली उठाकर उन्होंने कांग्रेसी खेमे में घुसने से पूर्व ही उनके लिए "नो इंट्री" का बोर्ड टंगा होगा, यह जसवंत पहले ही जानते हैं। लोग सोच रहे थे कि जसवंत सिंह का अब क्या होगा? क्या ऐसा भी कोई खूंटा है जहां बंधकर वह राजनीति में प्रभावी बने रह सकें। मगर यहां तो खूंटा खुद ही जसवंत सिंह के पास भागा हुआ आ रहा है। समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह ने साइकिल से भागते-भागते जसवंत सिंह को अपने साथ आने का आफर दे दिया। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तक अमर सिंह के राजनीतिक फार्मूले के कायल हैं।
इन दोनों सपाइयों को भ्रम हो गया है कि जसवंत सिंह ने अपने जिन्नागान से मुसलमानों में अपनी अच्छी छवि बना ली है। जसवंत के सपा में आने पर मुस्लिम वोट बैंक पर सपा की पकड़ मजबूत होगी। ऐसी सोच का तो भगवान ही मालिक है। जिन्ना की वंदना से जसवंत पाकिस्तानियों में थोड़ी-बहुत लोकप्रियता पा सकते हैं लेकिन किसी भारतीय पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? जसवंत सिंह को ऐसा खुला न्यौता देकर सपाइयों ने खुद को विनोद का विषय बना डाला है। जसवंत सिंह को पार्टी में आने का ऑफर देना यह प्रमाणित करता है कि इस राजनीतिक दल में देशव्यापी पहचान वाले चेहरों का घोर अभाव है। भाजपा से बाहर हुए कल्याण सिंह को लाल टोपी पहनाकर सपा नेतृत्व को अपने ही पुराने साथियों का असंतोष झेलना पड़ा। कुछेक लोकप्रिय फिल्मी हीरो-हीरोइनों के सहारे सपा की गाड़ी कितनी आगे बढ़ पाई है? कल्याण सिंह से दोस्ती की वजह दोनों पक्षों के अपने-अपने हित रहे हैं। कल्याण सिंह को चाहिए था ठौर और सपा को एक और मुखौटा। जसवंत सिंह पर डोरे डालने के पीछे वही भावना है। भाजपा ने अपने लिए अनुपयोगी जसवंत सिंह को भले बाहर कर दिया, परंतु सपा को उनमें फिर भी कुछ दिख रहा है। क्या इससे एक बार पुन: साबित नहीं हुआ कि हमारे यहाँ कुछ भी बेकार नही होता? चीज मिले भर लोग उसका उपयोग स्वयं तलाश लेते हैं।
और कुछ इतर,
आज ही मैंने एक लेख पढ़ा चेतन भगत का। उन्होंने लिखा है कि इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे या सांप्रदायिक? इससे हमारे जीवन पर क्या असर पड़ता है? जिन्ना को शांति से विश्राम करने दें। किताब जहां है उसे रहने दें। इतिहास जैसे विषय को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित न हों। एक नया विषय निर्मित करें, जिसका नाम हो- "भविष्य"। क्या वास्तव में चेतन की बात सोचने पर मजबूर नहीं करती। गड़े मुर्दे उखाड़कर हम भारत के भविष्य की कौन सी दिशा तय कर सकते हैं। जिन्ना या उन जैसे तमाम मामले भारत के लिए आज किस तरह प्रासंगिक हैं। हमें तो भारत के लिए भविष्य के नेता चुनने हैं, इतिहास के शिक्षक नहीं। जसवंत सिंह या आडवाणी कुछ भी लिखें, इससे क्या फर्क पड़ता है।


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Saturday, August 22, 2009

चिंतन बैठक, कारण और जसवंत का जाना

शिमला में लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार का मंथन करने के लिए भाजपा की चिंतन बैठक से पूर्व ही "धर्मनिरपेक्ष जिन्ना" के जिन्न के लपेटे में आ गये "जिन्ना, इंडिया-विभाजन-इंडिपेंडेंस" के लेखक और वरिष्ठ भाजपा नेता जसवंत सिंह। ताज्जुब की बात यह है कि भाजपा की हार के कारणों की जांच करने और आत्मचिंतन की मांग यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के साथ जसवंत सिंह बेहद जोर शोर से कर रहे थे और इस चिंतन बैठक में हार के जो फौरी कारण गिनाए गये-
- मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत टिप्पणी
- वरुण गांधी का भड़काऊ भाषण
-भावी पीएम के तौर पर नरेंद्र मोदी का नाम उछालना
- चुनावी कैम्पेन थीम का सही तरीके से पेश न होना
- नेतृत्व में एकता की कमी
- अपना अजेंडा पेश करने में नाकामी
- मुंबई अटैक पर कांग्रेस को घेर पाने में नाकामी
- बदले में कंधार मामले का चर्चा में आ जाना
- युवाओं से न जुड़ पाना
- गठजोड़ में कमजोरी, उड़ीसा में गठबंधन टूटना
- हरियाणा में पॉप्युलर मूड को न समझ पाना और पंजाब में सहयोगी के तौर-तरीके
में, कहीं भी जसवंत सिंह कारण नजर नहीं आये मगर जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताकर संघ की नाराजगी से बचने के लिए भाजपा से बाहर कर दिए गये जसवंत। मगर पार्टी के हार के कारणों के जो कारण बताये गये, उसके जिम्मेदार लोग तो पार्टी में ही बने हुए हैं और लालकृष्ण आडवाणी पार्टी अध्यक्ष बने रहेंगे। इसका तात्पर्य है कि पार्टी भविष्य की ओर नहीं देख रही और अपने पुराने इतिहास पर ही कायम है। आखिर हार के कारणों में तो युवाओं को पार्टी से न जोड़ पाना भी तो रहा मगर भाजपा आडवाणी के अलावा किसी और को देखना नहीं चाहती। ऐसे में पार्टी के युवा नेताओं में असंतोष से इनकार नहीं किया जा सकता जो कि चुनाव पूर्व से जारी है।
अगर हार के कारणों पर जरा शिद्दत से नजर डालें तो हर कारण के "कारण" काफी हद तक आडवाणी ही नजर आते हैं, मसलन पीएम पर व्यक्तिगत टिप्पणी उन्होंने ही शुरु की, मुंबई हमले के जवाब में कंधार मामला उठने पर यह बयान देना कि तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह के कंधार जाने की उन्हें जानकारी नहीं थी, (जिससे यह संदेश गया कि गृहमंत्री और विदेश मंत्री में एका नहीं है)। वैसे एकमात्र कारण उन्हें ही नहीं माना जा सकता मगर पीएम इन वेटिंग को जिम्मेदारी ओढ़नी थी, जिसका वह साहस नहीं दिखा सके।
चिंतन बैठक के बाद आडवाणी का विपक्ष का नेता बने रहने पर मुहर लगने से यह स्पष्ट हो गया कि वह खुद हार की जिम्मेदारी लेने से बचना चाह रहे हैं या उनमें ऐसे साहस की कमी है। यानि हार के कारणों को बेहद हल्केपन में लेना जो कि पार्टी के भविष्य के संबंध में खतरनाक संकेत दे रही है। मगर यह सवाल हमेशा ही बना रहेगा जिन्ना को सेक्युलर बताकर लालकृष्ण आडवाणी बाद में पार्टी की ओर देश के पीएम इन वेटिंग बने मगर जसवंत सिंह को दरवाजा दिखा दिया गया। इस संबंध में हमारे एक साथी ने एक टिप्पणी की जिसके सही होने का दावा नहीं किया जा सकता मगर परिस्थितियों को देखते हुए इसकी चर्चा जरुर की जा सकती है।
चुनावों में शिकस्त के बाद मीडिया से लेकर पार्टी के कुछ नेताओं ने भाजपा की करारी हार के लिए आडवाणी को पीएम एन वेटिंग पेश करने के साथ कंधार मामले में उनके दिये गये बयान को जिम्मेदार मानना शुरु कर दिया था जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत टिप्पणी भी कारणों में हावी रही। ऐसे में आडवाणी खुद को कमजोर समझने लगे थे और वे हार के कारणों पर चिंतन बैठक की मांग करने वाले जसवंत सिंह को हासिए पर डालने की ताक में थे। जसवंत सिंह ने भी उन्हें जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष और नेहरु तथा पटेल को बंटवारे के लिए जिम्मेदार ठहराकर दे दिया। इसके बाद मीडिया में जसवंत की आलोचना होने लगी और आडवाणी को मौका मिल गया। भाजपा ने चिंतन बैठक के पहले दिन मंथन शुरु होने से पूर्व ही उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।
खैर हमारे साथी की यह टिप्पणी कितनी वाजिब है, यह एक अलग मुद्दा है मगर परिस्थितियों को जोड़ने की उसकी कला का मैं कायल हो गया। खैर आडवाणी का बने रहना इसलिए भी जरुरी हो सकता है कि भाजपा के पास अभी भी कोई राष्ट्रीय चेहरा नहीं है जिसको सौंपकर आडवाणी अपनी राजनीतिक सक्रियता पर पूर्ण विराम लगा सकें। मगर जसवंत का जाने से भाजपा में ही असंतोष से इनकार नहीं किया जा सकता है।
जहां तक जसवंत सिंह की बात है तो जिन्ना पर किताब लिखने का प्रयास करना जसवंत सिंह एक बड़ी राजनीतिक चाल हो सकती थी। वह शायद उस मंजिल तक पहुंचना चाहते थे, जिस पर पहुंचने में आडवाणी असफल रहे। यह मकसद है, देश के मुसलमानों को अपने प्रति आकृष्ट करना। मगर इसमें वे असफल रहे और पार्टी से बाहर हो गये। लोकसभा चुनावों से पहले से बीजेपी में एक आंतरिक संघर्ष चल रहा है, जो चुनाव परिणाम के बाद और तीखा हुआ है।आडवाणी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी- ये सभी एक दूसरे के खिलाफ अखाड़े में खड़े हैं। इस स्थिति में ना तो कोई जसवंत सिंह से उनका मत पूछ रहा था, ना उन्हें कोई महत्व दिया जा रहा था। ऐसे में उनके सामने अपना वजूद साबित करने की जरुरत उन्होने समझी और इसके लिए जिन्ना का सहारा लिया। नतीजा जिन्ना के जिन्न ने उन्हें निगल लिया मगर भाजपा को अन्य किसी के जिन्न से बचने के लिए समझदारी और दूरदर्शिता दिखानी होगी।


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Friday, August 21, 2009

हो "जिगर" तो बनेगी प्रेम की डगर

हमारे देश में हर साल करीब दो लाख लोगों की मौत जिगर (लीवर) फेल होने से होती है। इनमें से २० से ३० हजार लोग बचाये जा सकते हैं मगर इनको जिगर प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। लेकिन जिगर प्रत्यारोपण के लिए "जिगर" कम ही लोग दिखाते हैं। भारत में जिगर प्रत्यारोपण के हर साल केवल तीन से चार सौ मामले आते हैं और यह बेहद निराशाजनक है। यह जागरुकता की कमी हो या कुछ और, मगर विज्ञान की तरक्की को जरुर मुंह चिढ़ाती नजर आती है। अभी पिछले दिनों दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में दो मरीजों का एक साथ जिगर प्रत्यारोपण का आपरेशन हुआ और "जिगर" वालों के जिगर से दो जिंदगियां बचाई जा सकीं। दरअसल इस ऑपरेशन की खास बात यह रही कि इसने राष्ट्रों की सीमाओं को दरकिनार कर दिया और प्रेम की नई डगर पर चलने का साहस दिखाया।


इस ऑपरेशन के माध्यम से बचीं दो देशों की दो जिंदगियां। एक भारतीय तो दूसरी नाईजीरियाई। दोनों परिवारों के लोग एक दूसरे को जानते तक न थे मगर "जिगर" के चलते दोनों एक दूसरे से अंतहीन प्रेम के बंधन में बंध गये। इसमें भारतीय दानकर्ता ने जहां नाईजीरिया के १७ माह बच्चे को नई जिंदगी दी, वहीं नाईजीरियाई महिला ने अपना जिगर देकर भारतीय महिला की जान बचाई। तीन महीने पहले तक नाईजीरिया में रहनेवाला 18 महीने का डीके और मुम्बई की 44 वर्षीय प्रिया आहुजा एक ही समस्या से जूझ रहे थे। दोनों के लीवर ख़राब हो चुके था और दोनों को लीवर ट्रांसप्लाट की ज़रुरत थी लेकिन यहां सबसे बडी दिक्कत थी ब्लड ग्रुप के मैचिंग की। दरअलस डीके का ब्लड ग्रुप बी था और उसकी मां चिन्वे का ए, डीके के पिता का ब्लड ग्रुप बेटे से मिलता तो था लेकिन उनके लीवर का आकार बडा था। वहीं प्रिया का ब्लड ग्रुप ए था और उनके पति हरीश का बी। ये दोनो ही मामले सर गंगा राम अस्पताल के डाक्टरों के सामने आए और उन्होंने काफ़ी विचार-विमर्श करने के बाद एक नायाब तरीक़ा निकाला- स्वैप लीवर ट्रांसप्लांट यानि दानदाताओं की अदला बदली। डीके लिए दानदाता बने हरीश और प्रिया के लिए डीके की मां चिन्वे. ऐसी सर्जरी भारत में पहली बार हुई और शायद पुरी दुनिया में ये अपनी तरह का पहला मामला है.इस ऑपरेशन में चार ओटी हुई जबकि 35 डॉक्टरों ने मिलकर इस ऑपरेशन को सफल बनाया। 16 घंटे तक लगातार ऑपरेशन के दौरान डिके को हरीश ने अपना २० फीसदी जिगर दिया जबकि प्रिया को चिन्वे ने ५० फीसदी जिगर।



इस ऑपरेशन के लिए जहां डॉक्टर्स सराहना के हकदार हैं वहीं भारत और नाईजीरिया के इन दो परिवारों ने पूरी दुनिया को नई रोशनी दे दी। वैसे सुनने में तो यह बेहद आसान लगता है कि दोनों परिवारों की जरुरतों ने एक दूसरे की मदद के लिए प्रेरित किया लेकिन इसके लिए भी जज्बा होना चाहिए, जो दोनों परिवारों ने दिखाया। वास्तव में इस जज्बे की सराहना की जानी चाहिए ताकि अन्य लोग भी इसके लीवर प्रत्यारोपण/स्वैप लीवर प्रत्यारोपण के लिए आगे आ सकें। नेत्र दान/अंग दान के लिए सरकारी प्रयास और तमाम एनजीओ के दिन रात प्रयासों की सफलता कितनी प्रतिशत रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। आज भी लोग ऐसे मामलों में बहुत पीछे नजर आते हैं। इसलिए डीके और प्रिया जैसे प्रयास को निश्चित ही उजागर किया जाना चाहिए क्योंकि इससे न सिर्फ जिंदगियां बचतीं हैं बल्कि प्रेम के एक नये युग का संचार होता है।


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Wednesday, July 8, 2009

"उयघूर दमन" पर उतारु चीन

वैसे ऐसा बहुत कम होता है कि दुनिया भर में कहीं भी मुस्लिम समुदाय या व्यक्ति पर, गलत/सही कोई भी कार्रवाई हो, चाहे ऐसे मामलों में मुस्लिम समुदाय ही दोषी क्यों न हो, दुनिया भर के मुस्लिम देशों में विरोध की आवाज जरुर उठती रही है मगर चीन में "उयघूर" मुस्लिमों के दमन पर अभी तक किसी भी देश ने कोई बयान जारी नहीं किया है. फ्रांस की सरकार ने हाल ही में जब बुर्के को महिलाओं की गुलामी की निशानी बताकर उस पर प्रतिबंध लगा दिया था तो कई मुस्लिम देशों ने इसे अपनी स्वतंत्रता और तहजीब पर आघात मानकर इसके खिलाफ आवाज उठायी थी. फ्रांस सरकार का यह फैसला गलत था या सही यह तो बात की बात लेकिन इन देशों का बुर्के के पक्ष में उनकी तहजीब और स्वतंत्रता पर खतरा उत्पन्न होने की दलील जरा गले नहीं उतरी क्योंकि महिलाओं को बुर्का पहनने पर मजबूर करना भी तो उनकी स्वतंत्रता पर तुषारापात जैसा ही है. इस बात पर आश्चर्य होता है उयघूर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध पश्चिमी देशों से आवाज उठ रही है लेकिन सारी दुनिया के मुसलमानों के हितों के लिए संघर्ष का दावा करने वाले ठेकेदार देश पाकिस्तान, ईरान और सउदी अरब की चीन के सामने घिग्घी बंधी हुई है। खैर, बात उयघूरों की
चीन के शिनझियांग प्रांत के उरुकमी में उयघूर मुस्लिमों और हान चीनियों के बीच पिछले कुछ दिनों की टकराव में सैकड़ों लोगों के मारे जाने के बीच मुस्लिम देशों की चुप्पी सालने वाली है। वैसे उयघूर मुस्लिमों के प्रति चीनी सरकार का यह दमनात्मक रवैया कोई पहली बार नहीं है। कई बार तो खबरों पर सरकारी नियंत्रण के चलते ऐसी खबरें बाहर नहीं आ पातीं. पिछले दो-तीन दिनों में शिंनझियांग के उरुकमी में उयघूर मुस्लिमों और हान चीनियों के बीच संघर्ष में पौने दो सौ उयघूर मुस्लिम मारे गये हैं। लगभग एक हजार घायल हैं। इस बीच शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया है जिसका सीधा सा मतलब है कि उयघूरों के प्रति चीनी सरकार के रवैये में कोई अंतर आने वाला नहीं है. चीन की इस दमनात्मक नीति के खिलाफ उयघूर मुस्लिम विरोध का झंडा बुलंद किए हुए हैं. इन विरोध प्रदर्शनों की सारी कार्रवाई, विश्व उयघूर कांग्रेस की नेता रबिया कदीर द्वारा चलायी जा रही है. रबिया कदीर उयघूर की एक निर्वासित महिला व्यावसायी हैं और फ़िलहाल अमेरिका में हैं. सुश्री कदीर को चीन सरकार ने अलगाववादी कार्रवाइयों में संलिप्त रहने का आरोप लगा कर उन्हें कई सालों तक जेल में बंद रखा था. उयघूर अलगाववादी समूहों का कहना है कि लोगों का विरोध सरकारी नीतियों और आर्थिक लाभों पर हान चीनी एकाधिकार के खिलाफ़ है. लेकिन अपनी भौगोलिक सीमा बढ़ाने को लेकर अक्सर ही दादागिरी करने वाला चीन इसे हिंसा फैलने के तौर पर देख रही है. वैसे भी चीनी सरकार ने कभी उयघूर मुस्लिमों के प्रति सम्माजनक नजरिए से देखने की जरुरत नहीं समझी.
* क्यों हुआ संघर्ष
दरअसल संघर्ष की वास्तविक वजह सालों से चले आ रहे चीनियों व उयघूरों के परस्पर संबंधों में छिपी है। दूसरे शब्दों में कहें तो आज मूल चीनी हान समुदाय व उइगरों के बीच सौहा‌र्द्र का एक अंश भी नहीं बचा। उयघूर और हान चीनियों के बीच हुई हिंसा के पीछे की कहानी यह है कि पिछले महीने उरुमकाई शहर की एक स्थानीय वेबसाइट पर यह लिख दिया गया कि शिनझियांग प्रांत से आए हान मूल के लड़कों ने दो उयघूर लड़कियों के साथ बलात्कार किया है. इसके बाद ही हान और उयघूर समुदायों के बीच संघर्ष में दो लोगों की मौत हो गयी थी जबकि 118 घायल हो गये थे. उस घटना के बाद से दोनों ही समुदायों में बदले की आग सुलग रही थी जिसने बीते रविवार की रात दंगों का रुप ले लिया. दंगों की शुरुआत शिनझियांग की राजधानी उरुमकी में शुरु हुई. इसके बाद से ही हुए संघर्ष में 166 से अधिक लोग मारे गये. चूंकि इस इस संघर्ष के बाद चीनी सरकार ने इंटरनेट पर रोक लगा दी, इसलिए उसकी कार्रवाई पर संदेह होना लाजिमी है.
* संघर्ष के मूल में कुछ और तो नहीं
वैसे इस संघर्ष के मूल में कुछ दूसरी कहानी भी हो सकती है. उयघूर मुस्लिमों का आरोप है कि चीन की सरकार हान लोगों कों उरुमकाई शहर में जबरदस्ती बसा रही है. उरूमकाई शहर (शिनझियांग प्रांत) की बात करें तो यह चीन का मुस्लिम बहुल इलाका है। उरुमकाई की आबादी लगभग 23 लाख के करीब है जबकि शिनझियांग क्षेत्र में 80 लाख उयघूर मुस्लिम हैं. ये उयघूर समुदाय चीनी सरकार पर अपने अधिकारों के दमन का आरोप लगाते रहे हैं। शिनझियांग प्रांत मूल रुप से उयघूरों का ही क्षेत्र है लेकिन उसकी स्वायत्तता चीन को बर्दाश्त नहीं हुई और पूर्व में उसने इस क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाने के बाद धीरे-धीरे चीन के मूल निवासियों हान को बसाना शुरु कर दिया. इससे न सिर्फ असंतुलन बढ़ा बल्कि इन दोनों समुदायों के बीच संघर्ष शुरु हो गया. इस संघर्ष के बहाने चीन सरकार को अपनी दमनात्मक नीति को आगे बढ़ाने का मौका और छूट मिल गयी. वैसे भी उसकी बढ़ती ताकत को देखकर कोई और देश उसके खिलाफ आवाज नहीं उठा पाता. उयघूर की स्थिति की तुलना चीन के कब्जे वाले तिब्बत से की जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख कर चीन जिस तरह तिब्बत को हड़पे बैठा है वैसा ही उसने शिंनझियांग प्रांत के तेल बहुल उस इलाके में किया जहां उयघूर मुसलमान अधिक हैं। लेकिन तिब्बत की तुलना में शिंनझियांग की परिस्थितियां थोड़ी भिन्न हैं। वैसे चीनी की नजर इस क्षेत्र पर इसलिए भी है क्योंकि यह तेल व खनिज भंडारों से समृद्ध है. शिनझियांग की सीमा मध्य एशिया के आठ देशों को छूती हैं, जिनमें भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी शामिल हैं। चीन की बढ़ती आर्थिक व राजनीतिक ताकत के प्रति उयघूर नाखुशी दर्शाते रहे हैं। उयघूरों व चीनियों के संबंध सदियों पहले सिल्क रूट से जुड़े हैं। इसी सिल्क मार्ग से पश्चिम एशिया, यूरोप व भारतीय उपमहाद्वीप में चीनी रेशम का व्यापार होता था। लेकिन बीते रविवार को शिनजियांग की राजधानी उरुमकी में भड़के दंगों में सारी सीमाएं टूट गईं।
* उयघूर कौन
इस्टर्न और सेंट्रल एशिया में निवास करने वाले उयघूर मूलत: तुर्की समुदाय से संबंध रखने वाले मुस्लिम हैं। वर्तमान की बात करें तो ये मुख्यरुप से चीन के शिनझियांग क्षेत्र में रहते हैं जिसे "शिनजियांग उयघूर ऑटोनॉमस रीजन" कहा जाता है. वैसे इसे इसके विवादास्पद "उयघूरस्तान/पूर्वी तुर्कीस्तान" के नाम से भी जाना जाता है. (अंग्रेजी में Uyghur, Uighur, Uygur और Uigur के रुप में प्रयोग किया जाता है.) उयघूर मुस्लिम कजाखस्तान, किर्गीस्तान, उजबेकिस्तान में अधिक संख्या में और मंगोलिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रुस में कुछ संख्या में हैं लेकिन मुख्य रुप से अब यह समुदाय चीन की राजधानी बीजिंग और शंघाई में ही हैं.इतिहास की नजर से देखें तो तुर्की भाषा बोलने उयघूर मध्य एशिया के एल्टे माउंटेन, गोक्टर्स के आस-पास रहने वाले थे। पिछले दो हजार सालों में उयघूर मुस्लिमों ने काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी यहां राज करने वाले उयघूर आज दमन सहने पर मजबूर हैं।
* आतंकवादी बताता रहा है चीन
प्राचीनकाल से विस्तारवादी प्रवृत्तिवाला चीन कभी उयघूर मुस्लिमों पर विश्वास नहीं कर सका। चीन उन्हें हमेशा से ही पृथकतावादी और उग्रवादी बताया जाता रहा और इसके नाम पर उनका निरंतर दमन किया गया। ताजा विवाद के बाद यह तो तय है कि उयघूर मुस्लिमों में चीनी शासकों के प्रति नफरत दो गुनी बढ़ चुकी होगी। उनका संघर्ष और विरोध इस तरह के दमन से दम नहीं तोडऩे वाला। उयघूर दशकों से चीन से स्वतंत्रता के लिए आंदोलन कर रहे हैं। उनका धैर्य जब टूटने लगता और हताशा बढ़ती है तो वे हिंसा का सहारा लेने लगते हैं। लेकिन चीनी सरकार द्वारा बताया यह जाता रहा कि संदिग्ध उयघूर मुस्लिम आतंकवादियों की धरपकड़ के लिए इस तरह की कार्रवाई की जाती है। इन आरोपों को गलत नहीं कहा जा सकता कि चीन की जेलों और गुप्त यातनागृहों में सैकड़ों उयघूर मुस्लिम फंसे हुए हैं। पिछले साल बीजिंग ओलंपिक के दौरान चीन में हुए भीषण विस्फोट में डेढ़ दर्जन पुलिसकर्मी मारे गये थे। तब इसे सरकार ने उयघूर आतंकवादियों की करतूत करार दिया था और कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया था
* थोपा गया सांस्कृतिक औपनिवेशवाद
सामान्य रूप से देखें तो उयघूर व चीन के संबंध खासे उलझे नजर आते हैं। शिनजियांग चीन के बनिस्बत पाकिस्तान, उज्बेकिस्तान व कजाखिस्तान के कहीं ज्यादा करीब दिखाई देता है। काशगर की सड़कों पर घूमते हुए ऐसा नही लगता कि यह चीन का कोई इलाका है। चीन लोगों की राय में उयघूरों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। वे जेबकतरे हैं और ऐसे ही कामों में लिप्त रहते हैं। दोनों की संस्कृति, आचार-विचार, धर्म व राजनीति सोच में काफी भिन्नता है। यही कारण है कि उयघूर समुदाय इसे थोपा गया सांस्कृतिक औपनिवेशवाद करार देते हैं जबकि चीनी सरकार का कहना है कि अलगाववादी उयघूर इस्लामिक कंट्टरपंथी हैं जिनका मकसद शिनझियांग को चीन से आजाद कराना है। जानकारों की राय में 1989 में थ्येनआनमन नरसंहार के बाद चीन में यह सबसे बड़ी घटना है। वर्तमान में उरुम्की में हानवंशी चीनियों का दबदबा बढ़ रहा है। शिनझियांग में करीब एक करोड़ उयघूर रहते हैं और अधिकांश चीन से आजादी चाहते हैं। उनके मुताबिक यहां रह रही हानवंशियों की एक बड़ी आबादी उन्हें बाहर खदेड़ने पर तुली है। मानवाधिकार समूहों व उयघूर कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार हर चीज को बढ़ा-चढ़ा कर बता रही है ताकि अपनी दमनात्मक कार्रवाई को सही ठहरा सके।


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Monday, July 6, 2009

युगपुरुष बने फेडरर


स्विट्जरलैंड के रॉजर फेडरर ने रविवार को मैराथन मुकाबले में अमेरिका के ऐंडी रॉडिक को हराकर विंबलडन टूर्नामंट जीत लिया। फेडरर का यह 15वां ग्रैंड स्लैम खिताब रहा। इस जीत के साथ ही फेडरर ने सबसे ज्यादा ग्रैंड स्लैम जीतने का इतिहास रच दिया। पहले यह रेकॉर्ड अमेरीका के पीट सैम्प्रास के नाम था। उन्होंने अपने करियर के दौरान 14 ग्रैंड स्लैम जीते थे। फेडरर रेकॉर्ड 20वीं बार किसी भी ग्रैंड स्लैम के फाइनल में पहुंचे थे। इस रिकॉर्ड के साथ युगपुरुष बने फेडरर के कुछ विशेष क्षणों पर एक नजर
15-14 का भाग्यशाली संयोग
टेनिस के युगपुरुष बन चुके रोजर फेडरर के लिए उनके ग्रैंड स्लेम रिकार्ड की संख्या ही अंततः भाग्यशाली रही। फेडरर को अमेरिका के पीट सम्प्रास का 14 ग्रैंड स्लेम खिताबों का विश्वरिकार्ड तोड़ने के लिए 15 वें खिताब की जरूरत थी। फेडरर और अमेरिका के एंडी रोडिक के बीच खिताबी मुकाबला जब पांचवें और निर्णायक सेट में प्रवेश कर गया तो किसी को उम्मीद नहीं थी कि यह इतना लंबा खिचेगा। इस सेट में 6-6 की बराबरी के बाद नियमानुसार लगातार दो गेम जीतने वाले खिलाड़ी को ही विजेता बनना था। दोनों के बीच मुकाबला गेम दर गेम आगे बढते हुए 14-14 की बराबरी पर पहुंचा। फेडरर को एक सर्विस ब्रेक की तलाश थी जो वह पूरे मैच में अब तक हासिल नहीं कर पाए थे। उन्होंने 29 वें गेम में अपनी सर्विस बरकरार रखते हुए 15-14 की बढ़त बनाई। अंततः यही संख्या उनके लिए भाग्यशाली साबित हुई और अगले गेम में उन्हें वह ब्रेक मिल गया जिसकी उन्हें तलाश थी।
साक्षी बने सम्प्रास- पीट सम्प्रास विंबलडन में अपने ही रिकार्ड टूटने के साक्षी बने। वर्ष 2002 में दूसरे दौर में विंबलडन से बाहर होने के बाद सम्प्रास फिर कभी विंबलडन में नहीं लौटे थे। लेकिन लगता है कि जैसे इसबार उन्हें यकीन था कि उनका रिकार्ड जरूर टूटेगा और वह फेडरर को यह इतिहास बनाते देखने के लिए विंबलडन के रायल बाक्स में मौजूद थे। संप्रास ने फेडरर की कामयाबी के बाद खुद उन्हें बधाई भी दी। संप्रास जब फेडरर को बधाई दे रहे थे तो उनके साथ महान राड लेवर और ब्योर्न बोर्ग भी मौजूद थे।
76 गेम के बाद मिला ब्रेक -रोडिक के खिलाफ मैच में फेडरर को चार घंटे 15 मिनट के बाद जाकर मैच का पहला ब्रेक नसीब हुआ। इस एक अदद ब्रेक के लिए फेडरर को 76 गेम तक इंतजार करना पड़। फेडरर के शानदार करिअर में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ होगा कि उन्हें एक ब्रेक के लिए इतना लंबा इंतजार करना पडा हो।
कोर्ट के रिकॉर्ड से बहुत दूर - फेडरर ने बेशक सम्प्रास का रिकार्ड तोड दिया हो लेकिन यदि महिला चैंपियनों से तुलना की जाए तो वह आस्ट्रेलिया की मारग्रेट कोर्ट के 24 ग्रैंड स्लेम रिकार्ड से काफी दूर हैं। कोर्ट ने अपने करिअर में 11 आस्ट्रेलियन, पांच फ्रेंच, तीन विंबलडन और पांच यूएस ओपन खिताब जीते थे। जर्मनी की स्टेफी ग्राफ 22 खिताबों के साथ दूसरे, अमेरिका की हेलेन मूडी 19 खिताबों के साथ तीसरे और अमेरिका की ही क्रिस एवर्ट तथा मार्टिना नवरातिलोवा 18-18 खिताबों के साथ संयुक्त चौथे नंबर पर हैं।
रिकार्डों के नाम रहा विंबलडन का फाइनल
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इस मैच में जीतकर स्विटजरलैंड के फेडरर ने 15 ग्रैंड स्लेम जीतने वाले पहले खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल कर लिया।
- फेडरर और रोडिक के बीच खेला गया फाइनल मैच गेम के हिसाब से टेनिस इतिहास का सबसे लंबा मैच था। इसके कुल पांच सेटों में 77 गेम खेले गए। पिछला रिकार्ड वर्ष 1927 में आस्ट्रेलियन चैंपियनशिप का था जिसमें 71 गेम खेले गए थे। इसके अलावा पिछले वर्ष फेडरर और नडाल के बीच खेले गए विंबलडन के फाइनल मुकाबले में 62 गेमों में फैसला हुआ था।
- फेडरर और रोडिक के बीच खेला गया पांचवां सेट पुरूषों के ग्रैंड स्लेम फाइनल मुकाबले का अब तक का सबसे लंबा सेट था। फेडरर ने इस सेट के अंतिम गेम को 16-14 से जीता1 इससे पहले का रिकार्ड 11-9 का था जो वर्ष 1927 में फ्रेंच ओपन में बना था।
- फाइनल के पांचवे सेट में सबसे ज्यादा गेम खेले जाने का भी रिकार्ड बना। इस सेट में कुल 30 गेम खेले गए जबकि पिछला रिकार्ड 24 गेम का था।
- फेडरर ने इस मुकाबले में सबसे ज्यादा एस भी लगाए। उन्होंने इस फाइनल मैच में कुल 50 एस लगाए। हालांकि वह इवा कार्लोविक के विंबलडन के 51 एस के रिकार्ड से एक एस पीछे रह गए। फेडरर का पिछला रिकार्ड 39 एस का था। उन्होंने वर्ष 2008 के आस्ट्रेलियन ओपन में जांको तिपसेरोव के खिलाफ 39 एस लगाए थे।


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