Thursday, September 10, 2009

"आपकि अंतरा", ऑटिस्म के प्रति जागरुक करता सीरियल


शुरुआत में तो यही लगा कि अंतरा सामान्य बच्चों जैसी नहीं है। अंतरा जैसी है उसे हमारा समाज पागल की श्रेणी में रखता है और उस समाज में मैं भी बाहर नहीं था। मगर जैसे-जैसे सीरियल आगे बढ़ता गया, मैं अपनी समझ को लेकर असामान्य सा होता गया। क्या जो बच्चा/व्यक्ति खुद में खोया रहता है, अपने आप में तल्लीन रहता है, जिसे दुनियादारी से फर्क नहीं पड़ता, जिसे यह नहीं पता कि संवेदना क्या होती, चोट लगना क्या होता है, भूख या प्यास क्या होता है, उसे पागल कहकर इतिश्री कर लेना चाहिए।
"आपकि अंतरा" जी टीवी पर रात में साढ़े आठ बजे प्रसारित होने वाले इस सीरियल का पिछले काफी समय से मैं दर्शक हूं। या यूं कहें कि पहले ही एपिसोड से। बीच में कुछ एपिसोड छूटे भी मगर नहीं छूटा तो इस सीरियल से अपनापन। जब भी मौका मिला 30 मिनट इस सीरियल के नाम कर दिया। जाने क्यूं पहले ही दिन से "अंतरा" से स्नेह सा हो गया जो लगातार बढ़ता ही जा रहा है। शुरुआत में तो यही लगा कि अंतरा सामान्य बच्चों जैसी नहीं है। अंतरा जैसी है उसे हमारा समाज पागल की श्रेणी में रखता है और उस समाज में मैं भी बाहर नहीं था। मगर जैसे-जैसे सीरियल आगे बढ़ता गया, मैं अपनी समझ को लेकर असामान्य सा होता गया। क्या जो बच्चा/व्यक्ति खुद में खोया रहता है, अपने आप में तल्लीन रहता है, जिसे दुनियादारी से फर्क नहीं पड़ता, जिसे यह नहीं पता कि संवेदना क्या होती, चोट लगना क्या होता है, भूख या प्यास क्या होता है, उसे पागल कहकर इतिश्री कर लेना चाहिए। शायद नहीं, तभी तो इस धारावाहिक के माध्यम से हम और हमारे जैसे समाज के गाल पर करारा तमाचा जड़ा गया है।
इस धारावाहिक ने धीरे-धीरे ही सही मगर ऑटिस्म के प्रति जागरुकता लाने का प्रयास किया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस कहानी का ताना-बाना कुछ इस तरह से बुना गया है कि यह कहीं भी कहानी से भटकता नहीं प्रतीत होता। केंद्रीय पात्र के रुप में अंतरा और उसके जैसे तमाम ऑटिस्टिक बच्चे हैं और उनकी दुनिया से परिचय तथा आम समाज उसके साथ कैसे सामान्य हो सकता है, को बेहद सतर्कता और संवेदनशीलता के साथ पेश किया गया है। इस धारावाहिक के प्रत्येक एपिसोड के अंत में एक ऑटिस्टिक बच्चे और उसकी फैमिली से जोड़ना बेहद सुकूं भरा होता है। यानि काल्पनिक चरित्र को यथार्थ के धरातल पर उतारने की कोशिश। ऐसे ही एक व्यक्ति से मिलवाया गया जो कि 26 साल की उम्र का था और उसे अपने परिवार से बहुत स्नेह मिला। परिवार के धैर्य पूर्वक स्नेह और डॉक्टर्स की निगरानी में वह व्यक्ति इतना सक्षम हो गया था कि कंप्यूटर का ज्ञान हासिल कर महीने में दो हजार रुपये तक की कमाई कर रहा था। यह बताते हुए उस व्यक्ति की मां की आंखों से आंसू का निकलना उनकी मेहनत के सफल होने का प्रमाण प्रस्तुत कर रहा था। लेकिन यह प्रमाण उससे कमाई करवाने का नहीं बल्कि समाज को यह दिखाने का कि एक असामान्य सा बच्चा/व्यक्ति भी अपने पैरों पर खड़ा कर सकता है।
अब बात ऑटिस्म की। यहां पर जो कुछ भी ऑटिस्म के बारे में लिख रहा हूं वह सब बेजी जैसन के ब्लॉग "स्पंदन" के सहारे लिख रहा हूं। उन्होंने "डॉक्टर की डेस्क" के माध्यम से इसके प्रति लोगों को जागरुक किया है। तमाम अवधारणाओं को स्पष्ट किया है जो हमने अपने मन में पूर्वाग्रह के रुप में बना रखा था। तो अब सब कुछ "स्पंदन" के सहारे
ऑटिस्म यानि आत्मानुचिंतन या स्वलीनता/आत्मकेंद्रित। ऑटिस्म यह एक ऐसी अवस्था है जो मस्तिष्क के सामर्थ्य को कम करती है। ऑटिस्म अभिव्यक्ति के गूंगेपन जैसी अवस्था है । व्यक्तित्व पर एक ऐसा ताला जिसकी चाभी गुम हो। एक व्यक्ति स्वयं अपने शरीर मे कैद। ऐसी बेबसी की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल है। इस रोग से जूझते बच्चे और उनका परिवार हमसे सिर्फ स्वीकृति चाहते हैं। यह अलग हैं..बुरे नहीं।
इससे ग्रसित व्यक्ति अपने आसपास की बात को आसानी से नहीं समझ पाता, उस पर प्रतिक्रिया देना तो दूर की बात है। इस वजह से उनका स्वभाव बाकियों से भिन्न होता है। कई बार उन्हे जरूरत और चाह के हिसाब से उपयुक्त शब्द नहीं मिलते तो वे सही शब्द की तलाश में एक ही शब्द या वाक्य दोहराते जाते हैं। इसके साथ ही वह लोगों की बात भी नहीं समझ पाता है। ऐसा नहीं कि वह शब्दों को साफ नहीं सुनते मगर वे उसका सही अर्थ समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे बच्चे के मन के भाव तेजी से बदलते हैं। जो बच्चा एक क्षण प्रसन्न दिखता है, अगले ही क्षण दुखी, खीजा हुआ, गुस्सैल भी हो सकता है। इसका कारण कोशिश करने पर भी अपनी बात व्यक्त न कर पाना हो सकता है। इन वजहों की लिस्ट बनाना नामुमकिन ना सही बहुत ही मुश्किल साबित होता है। यह अपने आप में इन बच्चों और इनका ध्यान रखने वाले और परवरिश करने वालों के लिए चुनौती साबित होता है। इससे उलझनें, भ्रांतियाँ,निराशा और कुण्ठा बढ़ती जाती है।
बहुत बच्चे एक ही पद्धति से कार्य करते हैं। इसमें ज़रा भी फेर करने पर स्वभाव बदल जाता है। कई गुस्सैल, परेशान, निराश हो जाते हैं नहीं तो डर जाते हैं। हर चीज़ अगर एक निर्धारित क्रम में चलता रहे तो वे संतुष्ट रहते हैं और अगर परिस्थिति का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सके तो स्वयं को असुरक्षित पाते हैं। एक अवस्था से दूसरे तक जाने में भी उनका संतुलन खोता है। हकीकत इन्हे भ्रमित करती है। एक बात और चीज़ को दूसरे से जोड़ कर देखना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है। ऑटिस्म को स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। हर बच्चे को यह अलग मात्रा में ग्रसित करती है । कुछ को कम, कुछ को ज्यादा। हर बच्चा अलग।
ऑटिस्टिक बच्चों में जो लक्षण आमतौर पर नजर आते हैं उनमें बोलचाल का कम होना, भाषा से अलग आवाज़ निकालना, देर से बोलना सीखना, एक ही शब्द,वाक्य बार बार बोलना, मैं और तुम जैसे सर्वनाम के प्रयोग में गलती करना, मेलमिलाप कम करना और नापसंद करना, आँख ना मिलाना, पूछी बात पर प्रतिक्रिया ना देना, चिड़चिड़ा रहना, हाथ हिलाते रहना,कूदना,गोल घूमना, बैलेंस बनाने की कोशिश करना,ऐड़ी पर चलना, कुछ आवाज़ों को सख्त नापसंद करना
कुछ कपड़ों, खाने की चीज़ों को नापसंद करना, बात दुहराना, खुद को नुकसान पहुँचाना। इनमें से कई बातें हो सकती है और कई नहीं भी। हर बात की तीव्रता भी अलग हो सकती है। हर बच्चा अलग होता है...और उसका सामर्थ्य भी।
हालांकि बेजी जैसन ने इस संबंध में कुछ गलत धारणायें भी बताई हैं जो इस प्रकार है
1. ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे कभी आँख नहीं मिलाते। ऐसा नहीं है। और काफी बच्चे निरंतर प्रयास करने के बाद सीखते भी हैं।
2.ऐसा बच्चा जीनियस होता है। हर आई क्यू का बच्चा ऑटिस्टिक हो सकता है।
3.ऐसा बच्चा प्यार नहीं दिखाता, समझता। प्यार की अभिव्यक्ति इन बच्चों के लिए मुश्किल जरूर है...असँभव नहीं। लगातार कोशिश के बाद बच्चे प्यार जताना और दिखाना सीख जाते हैं।
4.बच्चे में सुधार का मतलब बच्चे को तकलीफ नहीं है। सुधार का मतलब प्रयास, स्नेह और साँत्वना है।
5.मुस्कुराते बच्चे का मतलब वह ऑटिस्टिक नहीं है। गलत। हर लक्षण की तीव्रता अलग हो सकती है। 6.समय के साथ ऑटिस्म पीछे छूट जाता है। नहीं।इसे उपचार और लगातार प्रयास की जरूरत है। जिसके बाद ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण जीवन पा सकते हैं।
7.खराब परवरिश इसके लिए जिम्मेदार है।
कोई बच्चा ऑटिस्टिक है या नहीं यह जानने के लिए दो तरह के टेस्ट हैं
1- CHAT(Checklist for Autism in Toddlers test)
http://www.paains.org.uk/Autism/chat.htm
2- ATEC Test(Autism Treatment Evaluation Checklist )
http://www.autism.com/ari/atec/

कोई भी शंका के होने पर बाल रोग विशेषज्ञ नहीं तो चाइल्ड सायकोलोजिस्ट से मिलें। इस अवस्था के होने पर सही निदान और उपचार और लगातार प्रयास जरूरी है। अब तो ऑटिस्टिक बच्चों को जिंदगी के तौर-तरीके सिखाने के लिए भी क्लीनिक और कुछ साइंटिफिक तरीके ईजाद हो गये हैं। हालांकि ये 100 फीसदी कारगर तो नहीं हैं मगर समाज की मुख्य धारा से ऐसे बच्चों को जोड़ने में सहायक हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए बहुत सारा धैर्य और सही दृष्टिकोण चाहिए। अगर ऐसा हो सके तो ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण अस्तित्व पा सकते हैं। ऐसे बच्चे निर्धारित लक्ष्य पा सकते हैं और जीवन में कुछ बन सकते हैं।


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Wednesday, September 2, 2009

क्या कहूं कि मन मेरा कुलाचें भर रहा है....

यही कोई सात-साढ़े सात का वक्त हुआ रहा होगा। मैं अपने कंप्यूटर से भिड़ा हुआ था जैसा कि अमूमन होता ही है क्योंकि सीसीटीवी कैमरा संपादक की तरह आंखे जो तरेर रहा था। इस दौरान बार-बार "ओह", "अर र", "उफ", "अबे देख के" ........ जैसी आवाजें मेरा ध्यान भंग करने लगीं। इन आवाजों ने फेविकोल के जोड़ की तरह कुर्सी से चिपके होने के बावजूद मुझे उस ओर जाने को मजबूर कर दिया जिस ओर से आवाजें आ रही थीं।
वह सोमवार, 31 अगस्त का दिन था और ऐसा कोई खास भी नहीं था। सुबह 11 बजे के आस-पास ऑफिस पहुंचा तो भी कुछ विशेष नहीं प्रतीत हुआ। सब कुछ सामान्य सा था मगर शाम को जो हुआ वह कभी भी सामान्य न था। करीब पांच बजे हमारे सहयोगी यादव जी ने मुझसे पूछा "भई आज मैच कितने बजे से है।" मैं अपनी कुर्सी पर आराम से बैठे-बैठे भी हड़बड़ा गया। मैं अपने सहयोगी को ऊपर से नीचे तक देखा और उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी देखी। मैं जैसे ही बोलने को हुआ वह बोले "चाहे जितने बजे से हो, मैच तो भारत ही जीतेगा।" मैं समझ तो गया कि वह नेहरु कप फुटबाल के फाइनल की बात कर रहे हैं, मगर अंजान बनते हुए पूछने की हिमाकत कर बैठा "किस मैच की बात कर रहे हैं यादव जी।" थोड़ा मुंह टेढ़ा करते हुए यादव जी बोले "क्यों मजाक करते हैं सरजी। आपको तो पता होना ही चाहिए। आखिर इसकी खबर भी तो आप ही बनायेंगे ना।" मुझे ताज्जुब हुआ कि क्रिकेट के अलावा किसी और खेलों के बारे में सपने में भी नहीं सोचने वाले यादव जी को फुटबाल की इतनी चिंता क्यों हो रही है। खैर, उनको मैंने समय तो बता दिया और अपने काम में लग गया।
यही कोई सात-साढ़े सात का वक्त हुआ रहा होगा। मैं अपने कंप्यूटर से भिड़ा हुआ था जैसा कि अमूमन होता ही है क्योंकि सीसीटीवी कैमरा संपादक की तरह आंखे जो तरेर रहा था। इस दौरान बार-बार "ओह", "अर र", "उफ", "अबे देख के" ........ जैसी आवाजें मेरा ध्यान भंग करने लगीं। इन आवाजों ने फेविकोल के जोड़ की तरह कुर्सी से चिपके होने के बावजूद मुझे उस ओर जाने को मजबूर कर दिया जिस ओर से आवाजें आ रही थीं। देखता हूं तो पांच-छह लोग टीवी की ओर पलक झपकाये बिना नजरें गड़ाए हुए थे। उनको इस तरह से टीवी से चिपके हुए देखकर यह भ्रम हो सकता था कि क्रिकेट का कोई बेहद रोमांचक मैच चल रहा होगा मगर नहीं, यहां तो एक फुटबाल के पीछे 22 खिलाड़ी भाग रहे थे और ये सभी सांस थामे एकटक टीवी से चिपके हुए थे। मैं भी उसी में शामिल हो गया। बमुश्किल दस मिनट में ही खेल के दोनों हाफ गोलरहित समाप्त हो गये मगर भारतीय खिलाड़ियों द्वारा गंवाए गये मौकों की आलोचना शुरु हो चुकी थी, जो उत्साह बढ़ाने वाली थी।
कारण, फुटबाल के बारे में भी कोई ऐसे बात कर सकता है। इस बातचीत में धीरे-धीरे और लोग भी शरीक होते गये और मैच की रोमांचकता हमारे ऑफिस में अपना जगह बना चुकी थी। अतिरिक्त समय में खिंचे मैच में जब रेनेडी सिंह ने फ्री किक पर गोल दागा तो स्टेडियम में क्रिकेट मैचों जैसी भीड़ ने भूटिया एंड कंपनी को सिर आंखों पर बिठा लिया तो यहां यादव जी ने अपने एक साथी को गोद में उठा लिया, मानो उसी ने गोल दाग हो। मैच खत्म होने से महज कुछ सेकंड पहले सीरियाई खिलाड़ी ने बराबरी का गोल दाग दिया तो स्टेडियम का सन्नाटा हमारे यहां भी पसर चुका था। "अबे, स्सा...??? दो मिनट तक गेंद अपने पास नहीं रख सकते थे।" "अबे यार सारा मजा किरकिरा कर दिया।" "चल बंद कर दे यार टीवी, अब तो स्सा...??? हार ही जायेंगे।" मगर कोई टीवी बंद करने के लिए आगे नहीं आया। बहरहाल पेनॉल्टी स्ट्रोक के साथ रोमांच अपनी हद तक पहुंच चुका था। यादव जी एक स्टूल पर बैठे हुए थे लेकिन सडेन डेथ शुरु होते ही वे एक पैर स्टूल पर रखकर जरा टेढ़े खड़े हो गये। यादव जी क्रिकेट के मैचों के दौरान अमूमन ऐसे ही खड़े होते हैं। सातवें शॉट को भारतीय गोलकीपर सुब्रत ने जैसे ही रोका, भारत चैंपियन बन बैठा। लगातार दूसरी बार, उसी सीरियाई टीम को हराकर। मगर मुझे लगा कि भारत नहीं बल्कि यादव जी, गोपाले जी और वहां उपस्थित लोग चैंपियन बन गये हों। यादव जी पीछे पलटे और मुझे उठाकर अतिरोमांचित होकर बोले " सर जी हम फिर चैंपियन बन गये।" उनका यह कहना मुझे जरा भावुक कर गया।
खैर,
क्रिकेट से इतर खेलों में जब भी कोई खिलाड़ी देश का नाम रोशन करता है, मुझे बेहद खुशी होती है। मगर क्रिकेट के प्रति जैसी दीवानगी देखने को नजर आती है, वैसी दीवानगी से कहीं से भी कमतर नहीं था वह माहौल जिसका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूं। दरअसल क्रिकेट की लोकप्रियता की आलोचना करने वालों से जरा मैं कम सहमत हूं, यह चाहने के बावजूद कि क्रिकेट से इतर खेलों को भी सम्मान मिले। मुझे ऐसा लगता है कि जब भी अन्य खेलों में कोई उपलब्धि देश ने हासिल की है, संबंधित खिलाड़ियों को प्रशंसकों ने सिर माथे बिठाया है। चाहे वह विजेंदर व सुशील का बीजिंग में कांस्य जीतना रहा हो, विश्वनाथन आनंद का शतरंज का विश्व चैंपियन बनना रहा हो, सोमदेव का टेनिस में प्रदर्शन रहा हो या सानिया मिर्जा का सनसनीखेज प्रदर्शन। सायना नेहवाल को तो यहां कतई नहीं भुलाया जा सकता जिन्होंने चंद महीनों में खुद को बैडमिंटन की दुनिया में शीर्ष दस खिलाड़ियों में शामिल करा लिया है।
वास्तव में हम भारतीयों को पहले उपलब्धि चाहिए होती है और तब हम उसके प्रति अपनी दीवानगी दिखाते हैं। क्या 1980 से पहले हॉकी की दीवानगी किसी से छिपी हुई थी। शायद नहीं, लेकिन 1980 के बाद हॉकी में पतन से दीवानगी में कुछ कमी आनी शुरु हो चुकी थी। इसी दौरान क्रिकेट, जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते थे, ने 1983 में वर्ल्डकप जीतकर इतिहास रच डाला। इस उपलब्धि ने हॉकी से निराश हो चुके प्रशंसकों को क्रिकेट की ओर मोड़ दिया। क्रिकेट में उस उपलब्धि के बाद सफलता के साथ-साथ दीवानगी का आलम पूरे देश को चपेट में लेता गया। कपिल देव, गावस्कर, तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी लोगों के मनमस्तिष्क में छाते गये। 1992 में जब पेस ने ओलंपिक में टेनिस में एकल का कांस्य जीता तो टेनिस की लहर छा गयी। बाद में लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी की ग्रैंडस्लैम उपलब्धियों ने देश को सराबोर कर दिया। इसी दौरान सानिया मिर्जा का अभ्युदय हुआ। शुरुआत में बेहतरीन खेल दिखाने वाली सानिया बाद में अपनी खूबसूरती के कारण चर्चा के केंद्र में रहीं और चोटों से उनका कैरियर प्रभावित हुआ मगर टेनिस की लोकप्रियता बढ़ाने में उनका योगदान कहीं से कम नहीं है। 1996 में ही कर्णम मल्लेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग में ओलंपिक कांस्य जीता मगर बाद में यह खेल डोपिंग में उलझ गया तो प्रशंसकों ने भी भुला दिया। 2007 में जब भारत ने नेहरु कप का खिताब जीता तो पश्चिम बंगाल के अलावा भी लोग इस खेल से जुड़ गये। उसी की याद में इस साल लोग टीवी से चिपके हुए रहे कि भारत खिताब जीत सकता है। बहरहाल भारत ने भी अपने प्रशंसकों को निराश नहीं किया लेकिन क्या होता अगर भारत हार जाता। शायद 1980 के बाद जो हश्र हॉकी का हुआ वह महज दो सालों में (2007-2009) में फुटबाल का हो चुका होता।
वास्तव में मेरा मन कुलाचें भर रहा है। कुलाचें इसलिए कि हम एक बार फिर नेहरु कप में चैंपियन बनकर उभरे और साबित किया कि हमारी पिछली जीत तुक्का भर नहीं थी। कुलाचें इसलिए भी कि हमने क्रिकेट से इतर फिर किसी खेल में अपना रुतबा कायम किया। कुलाचें इसलिए भी कि हम भारतीय किसी उपलब्धि का जश्न मनाना नहीं चूकते और पलकों पर बिठा लेते हैं। मगर मेरी शिकायत भी है खेलप्रेमियों से कि वे बहुत जल्दी ही खिलाड़ियों व उनकी उपलब्धियों को भुला देते हैं।


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Thursday, August 27, 2009

जसवंत-जसवंत पुकारती "साइकिल"

आज अचानक ही सालों पहले एक महानगर के फुटपाथ पर उत्सुकता भरी निगाहों से देख रहे लोगों के हुजूम के बीच 'गोमती चक्र' पत्थर बेचने की कोशिश कर रहे साधु का वेश धरे उस फुटपथिया दुकानदार के मुंह से बार-बार निकल रही पंक्तियां याद आ गईं,
''हीरा पड़ा बाजार में लख आएं-लख जाएं,
मूरख-मूरख चल दिये ज्ञानी लाये उठाएं।"
इस पंक्ति में साफ कहा गया है कि हीरे की पहचान ज्ञानी को ही हो सकती है। हम रोज जाने कितनी ही चीजों को निरर्थक, अनुपयोगी, कबाड़ समझकर फेंक देते हैं मगर कचड़ा बीनने वाले बच्चे उसी में कुछ ऐसा तलाश लेते हैं जो उनकी पेट की आग शांत करने में मदद देती है। रद्दी-कबाड़ा खरीदने वाले के यहां सारी रद्दियां मसलन पेपर, बोतल, प्लास्टिक और लोहे के पुराने सामान, फटेहाल जूते-चप्पल सब कुछ बिक जाता है।

मतलब यह है कि भारत दुनिया के उन देशों में शुमार है जहां कुछ भी बेकार नहीं समझा जाता। यहां पर पुरानी से पुरानी चीज खरीदने वाले मिल ही जाएंगे। वैसे भी अब तो एक्सचेंज का जमाना आ चुका है। आप यह समझ रहे होंगे कि यह मैं क्या लिखे जा रहा हूं और किस संबंध में बात करना चाहता हूं। दरअसल, मैं यहां यह बताना चाहता हूं कि इस देश में कुछ भी अनुपयोगी नहीं माना जाता। घिसी-पिटी, मार खाई वस्तुओं तक का उपयोग कर लेने वाले लोग मौजूद हैं। अब देखिये ना, इसका ताजा उदाहरण समाजवादी पार्टी की टपकती लार को देखकर ही मिल गया। जसवंत सिंह को मोहम्मद अली जिन्ना को महिमा मंडित करने और नेहरु-पटेल को देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराने पर भाजपा से धकिया कर बाहर कर दिया गया। पढ़े-लिखे विद्वान जसवंत सिंह का कोई कोई पुख्ता जनाधार हो सकता है, यह भाजपा समेत अन्य लोग भी बेहतर जानते हैं। अत: भाजपा को लगा कि जसवंत उनके लिए अनुपयोगी हो चुके हैं और इस अनुपयोगी प्राणी को बाहर कर अपना घर साफ कर लिया जाना चाहिए, जिसमें जिन्ना, महिमा मंडन के धब्बे लग गये हैं। मौका भी शुभ था, गणेशोत्सव के समय आखिर घर साफ भी तो होना चाहिए न।
अब जसवंत सिंह कहां राह तलाशते, अपनी पुस्तक में पंडित जवाहर लाल नेहरू पर अंगुली उठाकर उन्होंने कांग्रेसी खेमे में घुसने से पूर्व ही उनके लिए "नो इंट्री" का बोर्ड टंगा होगा, यह जसवंत पहले ही जानते हैं। लोग सोच रहे थे कि जसवंत सिंह का अब क्या होगा? क्या ऐसा भी कोई खूंटा है जहां बंधकर वह राजनीति में प्रभावी बने रह सकें। मगर यहां तो खूंटा खुद ही जसवंत सिंह के पास भागा हुआ आ रहा है। समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह ने साइकिल से भागते-भागते जसवंत सिंह को अपने साथ आने का आफर दे दिया। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तक अमर सिंह के राजनीतिक फार्मूले के कायल हैं।
इन दोनों सपाइयों को भ्रम हो गया है कि जसवंत सिंह ने अपने जिन्नागान से मुसलमानों में अपनी अच्छी छवि बना ली है। जसवंत के सपा में आने पर मुस्लिम वोट बैंक पर सपा की पकड़ मजबूत होगी। ऐसी सोच का तो भगवान ही मालिक है। जिन्ना की वंदना से जसवंत पाकिस्तानियों में थोड़ी-बहुत लोकप्रियता पा सकते हैं लेकिन किसी भारतीय पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? जसवंत सिंह को ऐसा खुला न्यौता देकर सपाइयों ने खुद को विनोद का विषय बना डाला है। जसवंत सिंह को पार्टी में आने का ऑफर देना यह प्रमाणित करता है कि इस राजनीतिक दल में देशव्यापी पहचान वाले चेहरों का घोर अभाव है। भाजपा से बाहर हुए कल्याण सिंह को लाल टोपी पहनाकर सपा नेतृत्व को अपने ही पुराने साथियों का असंतोष झेलना पड़ा। कुछेक लोकप्रिय फिल्मी हीरो-हीरोइनों के सहारे सपा की गाड़ी कितनी आगे बढ़ पाई है? कल्याण सिंह से दोस्ती की वजह दोनों पक्षों के अपने-अपने हित रहे हैं। कल्याण सिंह को चाहिए था ठौर और सपा को एक और मुखौटा। जसवंत सिंह पर डोरे डालने के पीछे वही भावना है। भाजपा ने अपने लिए अनुपयोगी जसवंत सिंह को भले बाहर कर दिया, परंतु सपा को उनमें फिर भी कुछ दिख रहा है। क्या इससे एक बार पुन: साबित नहीं हुआ कि हमारे यहाँ कुछ भी बेकार नही होता? चीज मिले भर लोग उसका उपयोग स्वयं तलाश लेते हैं।
और कुछ इतर,
आज ही मैंने एक लेख पढ़ा चेतन भगत का। उन्होंने लिखा है कि इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे या सांप्रदायिक? इससे हमारे जीवन पर क्या असर पड़ता है? जिन्ना को शांति से विश्राम करने दें। किताब जहां है उसे रहने दें। इतिहास जैसे विषय को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित न हों। एक नया विषय निर्मित करें, जिसका नाम हो- "भविष्य"। क्या वास्तव में चेतन की बात सोचने पर मजबूर नहीं करती। गड़े मुर्दे उखाड़कर हम भारत के भविष्य की कौन सी दिशा तय कर सकते हैं। जिन्ना या उन जैसे तमाम मामले भारत के लिए आज किस तरह प्रासंगिक हैं। हमें तो भारत के लिए भविष्य के नेता चुनने हैं, इतिहास के शिक्षक नहीं। जसवंत सिंह या आडवाणी कुछ भी लिखें, इससे क्या फर्क पड़ता है।


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Saturday, August 22, 2009

चिंतन बैठक, कारण और जसवंत का जाना

शिमला में लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार का मंथन करने के लिए भाजपा की चिंतन बैठक से पूर्व ही "धर्मनिरपेक्ष जिन्ना" के जिन्न के लपेटे में आ गये "जिन्ना, इंडिया-विभाजन-इंडिपेंडेंस" के लेखक और वरिष्ठ भाजपा नेता जसवंत सिंह। ताज्जुब की बात यह है कि भाजपा की हार के कारणों की जांच करने और आत्मचिंतन की मांग यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के साथ जसवंत सिंह बेहद जोर शोर से कर रहे थे और इस चिंतन बैठक में हार के जो फौरी कारण गिनाए गये-
- मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत टिप्पणी
- वरुण गांधी का भड़काऊ भाषण
-भावी पीएम के तौर पर नरेंद्र मोदी का नाम उछालना
- चुनावी कैम्पेन थीम का सही तरीके से पेश न होना
- नेतृत्व में एकता की कमी
- अपना अजेंडा पेश करने में नाकामी
- मुंबई अटैक पर कांग्रेस को घेर पाने में नाकामी
- बदले में कंधार मामले का चर्चा में आ जाना
- युवाओं से न जुड़ पाना
- गठजोड़ में कमजोरी, उड़ीसा में गठबंधन टूटना
- हरियाणा में पॉप्युलर मूड को न समझ पाना और पंजाब में सहयोगी के तौर-तरीके
में, कहीं भी जसवंत सिंह कारण नजर नहीं आये मगर जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताकर संघ की नाराजगी से बचने के लिए भाजपा से बाहर कर दिए गये जसवंत। मगर पार्टी के हार के कारणों के जो कारण बताये गये, उसके जिम्मेदार लोग तो पार्टी में ही बने हुए हैं और लालकृष्ण आडवाणी पार्टी अध्यक्ष बने रहेंगे। इसका तात्पर्य है कि पार्टी भविष्य की ओर नहीं देख रही और अपने पुराने इतिहास पर ही कायम है। आखिर हार के कारणों में तो युवाओं को पार्टी से न जोड़ पाना भी तो रहा मगर भाजपा आडवाणी के अलावा किसी और को देखना नहीं चाहती। ऐसे में पार्टी के युवा नेताओं में असंतोष से इनकार नहीं किया जा सकता जो कि चुनाव पूर्व से जारी है।
अगर हार के कारणों पर जरा शिद्दत से नजर डालें तो हर कारण के "कारण" काफी हद तक आडवाणी ही नजर आते हैं, मसलन पीएम पर व्यक्तिगत टिप्पणी उन्होंने ही शुरु की, मुंबई हमले के जवाब में कंधार मामला उठने पर यह बयान देना कि तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह के कंधार जाने की उन्हें जानकारी नहीं थी, (जिससे यह संदेश गया कि गृहमंत्री और विदेश मंत्री में एका नहीं है)। वैसे एकमात्र कारण उन्हें ही नहीं माना जा सकता मगर पीएम इन वेटिंग को जिम्मेदारी ओढ़नी थी, जिसका वह साहस नहीं दिखा सके।
चिंतन बैठक के बाद आडवाणी का विपक्ष का नेता बने रहने पर मुहर लगने से यह स्पष्ट हो गया कि वह खुद हार की जिम्मेदारी लेने से बचना चाह रहे हैं या उनमें ऐसे साहस की कमी है। यानि हार के कारणों को बेहद हल्केपन में लेना जो कि पार्टी के भविष्य के संबंध में खतरनाक संकेत दे रही है। मगर यह सवाल हमेशा ही बना रहेगा जिन्ना को सेक्युलर बताकर लालकृष्ण आडवाणी बाद में पार्टी की ओर देश के पीएम इन वेटिंग बने मगर जसवंत सिंह को दरवाजा दिखा दिया गया। इस संबंध में हमारे एक साथी ने एक टिप्पणी की जिसके सही होने का दावा नहीं किया जा सकता मगर परिस्थितियों को देखते हुए इसकी चर्चा जरुर की जा सकती है।
चुनावों में शिकस्त के बाद मीडिया से लेकर पार्टी के कुछ नेताओं ने भाजपा की करारी हार के लिए आडवाणी को पीएम एन वेटिंग पेश करने के साथ कंधार मामले में उनके दिये गये बयान को जिम्मेदार मानना शुरु कर दिया था जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत टिप्पणी भी कारणों में हावी रही। ऐसे में आडवाणी खुद को कमजोर समझने लगे थे और वे हार के कारणों पर चिंतन बैठक की मांग करने वाले जसवंत सिंह को हासिए पर डालने की ताक में थे। जसवंत सिंह ने भी उन्हें जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष और नेहरु तथा पटेल को बंटवारे के लिए जिम्मेदार ठहराकर दे दिया। इसके बाद मीडिया में जसवंत की आलोचना होने लगी और आडवाणी को मौका मिल गया। भाजपा ने चिंतन बैठक के पहले दिन मंथन शुरु होने से पूर्व ही उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।
खैर हमारे साथी की यह टिप्पणी कितनी वाजिब है, यह एक अलग मुद्दा है मगर परिस्थितियों को जोड़ने की उसकी कला का मैं कायल हो गया। खैर आडवाणी का बने रहना इसलिए भी जरुरी हो सकता है कि भाजपा के पास अभी भी कोई राष्ट्रीय चेहरा नहीं है जिसको सौंपकर आडवाणी अपनी राजनीतिक सक्रियता पर पूर्ण विराम लगा सकें। मगर जसवंत का जाने से भाजपा में ही असंतोष से इनकार नहीं किया जा सकता है।
जहां तक जसवंत सिंह की बात है तो जिन्ना पर किताब लिखने का प्रयास करना जसवंत सिंह एक बड़ी राजनीतिक चाल हो सकती थी। वह शायद उस मंजिल तक पहुंचना चाहते थे, जिस पर पहुंचने में आडवाणी असफल रहे। यह मकसद है, देश के मुसलमानों को अपने प्रति आकृष्ट करना। मगर इसमें वे असफल रहे और पार्टी से बाहर हो गये। लोकसभा चुनावों से पहले से बीजेपी में एक आंतरिक संघर्ष चल रहा है, जो चुनाव परिणाम के बाद और तीखा हुआ है।आडवाणी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी- ये सभी एक दूसरे के खिलाफ अखाड़े में खड़े हैं। इस स्थिति में ना तो कोई जसवंत सिंह से उनका मत पूछ रहा था, ना उन्हें कोई महत्व दिया जा रहा था। ऐसे में उनके सामने अपना वजूद साबित करने की जरुरत उन्होने समझी और इसके लिए जिन्ना का सहारा लिया। नतीजा जिन्ना के जिन्न ने उन्हें निगल लिया मगर भाजपा को अन्य किसी के जिन्न से बचने के लिए समझदारी और दूरदर्शिता दिखानी होगी।


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Friday, August 21, 2009

हो "जिगर" तो बनेगी प्रेम की डगर

हमारे देश में हर साल करीब दो लाख लोगों की मौत जिगर (लीवर) फेल होने से होती है। इनमें से २० से ३० हजार लोग बचाये जा सकते हैं मगर इनको जिगर प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। लेकिन जिगर प्रत्यारोपण के लिए "जिगर" कम ही लोग दिखाते हैं। भारत में जिगर प्रत्यारोपण के हर साल केवल तीन से चार सौ मामले आते हैं और यह बेहद निराशाजनक है। यह जागरुकता की कमी हो या कुछ और, मगर विज्ञान की तरक्की को जरुर मुंह चिढ़ाती नजर आती है। अभी पिछले दिनों दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में दो मरीजों का एक साथ जिगर प्रत्यारोपण का आपरेशन हुआ और "जिगर" वालों के जिगर से दो जिंदगियां बचाई जा सकीं। दरअसल इस ऑपरेशन की खास बात यह रही कि इसने राष्ट्रों की सीमाओं को दरकिनार कर दिया और प्रेम की नई डगर पर चलने का साहस दिखाया।


इस ऑपरेशन के माध्यम से बचीं दो देशों की दो जिंदगियां। एक भारतीय तो दूसरी नाईजीरियाई। दोनों परिवारों के लोग एक दूसरे को जानते तक न थे मगर "जिगर" के चलते दोनों एक दूसरे से अंतहीन प्रेम के बंधन में बंध गये। इसमें भारतीय दानकर्ता ने जहां नाईजीरिया के १७ माह बच्चे को नई जिंदगी दी, वहीं नाईजीरियाई महिला ने अपना जिगर देकर भारतीय महिला की जान बचाई। तीन महीने पहले तक नाईजीरिया में रहनेवाला 18 महीने का डीके और मुम्बई की 44 वर्षीय प्रिया आहुजा एक ही समस्या से जूझ रहे थे। दोनों के लीवर ख़राब हो चुके था और दोनों को लीवर ट्रांसप्लाट की ज़रुरत थी लेकिन यहां सबसे बडी दिक्कत थी ब्लड ग्रुप के मैचिंग की। दरअलस डीके का ब्लड ग्रुप बी था और उसकी मां चिन्वे का ए, डीके के पिता का ब्लड ग्रुप बेटे से मिलता तो था लेकिन उनके लीवर का आकार बडा था। वहीं प्रिया का ब्लड ग्रुप ए था और उनके पति हरीश का बी। ये दोनो ही मामले सर गंगा राम अस्पताल के डाक्टरों के सामने आए और उन्होंने काफ़ी विचार-विमर्श करने के बाद एक नायाब तरीक़ा निकाला- स्वैप लीवर ट्रांसप्लांट यानि दानदाताओं की अदला बदली। डीके लिए दानदाता बने हरीश और प्रिया के लिए डीके की मां चिन्वे. ऐसी सर्जरी भारत में पहली बार हुई और शायद पुरी दुनिया में ये अपनी तरह का पहला मामला है.इस ऑपरेशन में चार ओटी हुई जबकि 35 डॉक्टरों ने मिलकर इस ऑपरेशन को सफल बनाया। 16 घंटे तक लगातार ऑपरेशन के दौरान डिके को हरीश ने अपना २० फीसदी जिगर दिया जबकि प्रिया को चिन्वे ने ५० फीसदी जिगर।



इस ऑपरेशन के लिए जहां डॉक्टर्स सराहना के हकदार हैं वहीं भारत और नाईजीरिया के इन दो परिवारों ने पूरी दुनिया को नई रोशनी दे दी। वैसे सुनने में तो यह बेहद आसान लगता है कि दोनों परिवारों की जरुरतों ने एक दूसरे की मदद के लिए प्रेरित किया लेकिन इसके लिए भी जज्बा होना चाहिए, जो दोनों परिवारों ने दिखाया। वास्तव में इस जज्बे की सराहना की जानी चाहिए ताकि अन्य लोग भी इसके लीवर प्रत्यारोपण/स्वैप लीवर प्रत्यारोपण के लिए आगे आ सकें। नेत्र दान/अंग दान के लिए सरकारी प्रयास और तमाम एनजीओ के दिन रात प्रयासों की सफलता कितनी प्रतिशत रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। आज भी लोग ऐसे मामलों में बहुत पीछे नजर आते हैं। इसलिए डीके और प्रिया जैसे प्रयास को निश्चित ही उजागर किया जाना चाहिए क्योंकि इससे न सिर्फ जिंदगियां बचतीं हैं बल्कि प्रेम के एक नये युग का संचार होता है।


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